মুসনাদে আহমাদ মুসনাদে আলী ইবনে আবি তালিব (রাঃ) [আলীর বর্ণিত হাদীস] (مسند علي بن أبي طالب)

পরিচ্ছেদঃ

৫৬২। আলী ইবনে আবী তালিব থেকে বর্ণিত। তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আরাফাতে অবস্থান করলেন। অতঃপর তিনি বললেনঃ এটা হচ্ছে অবস্থানের জায়গা। সমগ্র আরাফাতই অবস্থানের জায়গা। সূর্য অস্ত যাওয়া মাত্রই তিনি সেখান থেকে রওনা হলেন। উসামাকে পেছনে বসালেন এবং নিজের উটটাকে জোরে জোরে চালালেন। অন্য লোকেরা ডানে বামে চলতে লাগলো। তিনি তাদের দিকে তাকিয়ে বলতে লাগলেন, “হে জনতা, প্রশান্তি!” অতঃপর একদল লোকের কাছে এলেন এবং মাগরিব ও ইশার নামাযে তাদের ইমামতি করলেন। অতঃপর রাত গিয়ে যখন ভোর হলো, তিনি কুযাহতে এলেন এবং কুযাহতে অবস্থান করলেন। তখন তিনি বললেনঃ এটা অবস্থানের জায়গা এবং একটি সমাবেশের জায়গা। পুরো কুযাহাই অবস্থানের জায়গা।

এরপর তিনি আবার চলা শুরু করলেন এবং মুহাসসার উপত্যকায় এলেন ও সেখানে (কিছু সময়) অবস্থান করলেন। তারপর তাঁর উটনীকে ধাক্কা দিয়ে তুললেন। উটটি দুলকি চালে চলে উপত্যকা পার হয়ে গেল। অতঃপর উটনীকে থামালেন এবং ফযলকে পেছনে বসালেন। অতঃপর জামরায় এলেন ও পাথর নিক্ষেপ করলেন। তারপর কুরবানীর জায়গায় এলেন। তারপর বললেন, এটা কুরবানীর জায়গা এবং সমগ্ৰ মিনাই কুরবানীর জায়গা। বর্ণনাকারী বলেন, এই সময় খাসিয়াম গোত্রের এক যুবতী মেয়ে তাঁর নিকট জিজ্ঞাসা করলো যে, আমার বাবা এত বৃদ্ধ যে, চলৎশক্তি রহিত। অথচ তার ওপর হজ্জ ফরয হয়েছে। আমি তার পক্ষ থেকে হজ্জ করলে কি তার হজ্জ আদায় হবে? তিনি বললেনঃ হ্যাঁ, তুমি তোমার বাবার পক্ষ থেকে হজ্জ কর।”

এই সময় তিনি ফযলের ঘাড় ঘুরিয়ে দিলেন। আব্বাস (রাঃ) বললেন, হে আল্লাহ্‌র রাসূল, আপনি আপনার চাচাতো ভাইয়ের ঘাড় ঘুরিয়ে দিলেন কেন? তিনি বললেন, আমি একজন যুবক ও যুবতীকে পাশাপাশি দেখলাম। তাদেরকে শয়তান থেকে নিরাপদ মনে করলাম না। এরপর তার নিকট আর এক ব্যক্তি এল। সে বললোঃ ইয়া রাসূলাল্লাহ, আমি তো কুরবানীর আগেই চুল কামিয়েছি। তিনি বললেন, কোন অসুবিধা নেই, কুরবানী কর। এরপর তাঁর নিকট আর একজন এল। সে বললোঃ ইয়া রাসূলাল্লাহ, আমি চুল কামানোর আগেই রওনা হয়েছি। তিনি বললেনঃ কোন সমস্যা নেই, চুল কামাও অথবা ছাটাও। তারপর তিনি বাইতুল্লায় এলেন ও তাওয়াফ করলেন। তারপর যমযমে এলেন এবং বললেনঃ হে আবদুল মুত্তালিবের গোত্ৰ, তোমাদের পানির উৎসকে রক্ষা কর। লোকেরা এর ওপর হুমড়ি খেয়ে পড়বে এই আশঙ্কা না থাকলে আমি নিজে তা থেকে পানি টেনে তুলতাম।

[ইবনু খুযাইমা-২৮৮৯, ২৮৭৩, আবু দাউদ-১৯২২, ১৯৩৫, ইবনু মাজ-৩০১০, তিরমিযী-৮৮৫, মুসনাদে আহমাদ-৫২৫, ৫৬৪, ৬১৩, ৭৬৮, ১৩৪৮]

حَدَّثَنَا أَبُو أَحْمَدَ مُحَمَّدُ بْنُ عَبْدِ اللهِ بْنِ الزُّبَيْرِ، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، عَنْ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ الْحَارِثِ بْنِ عَيَّاشِ بْنِ أَبِي رَبِيعَةَ، عَنْ زَيْدِ بْنِ عَلِيٍّ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ عُبَيْدِ اللهِ بْنِ أَبِي رَافِعٍ، عَنْ عَلِيِّ بْنِ أَبِي طَالِبٍ رَضِيَ اللهُ عَنْهُ، قَالَ: وَقَفَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ بِعَرَفَةَ فَقَالَ: " هَذَا الْمَوْقِفُ، وَعَرَفَةُ كُلُّهَا مَوْقِفٌ " وَأَفَاضَ حِينَ غَابَتِ الشَّمْسُ، ثُمَّ أَرْدَفَ أُسَامَةَ، فَجَعَلَ يُعْنِقُ عَلَى بَعِيرِهِ، وَالنَّاسُ يَضْرِبُونَ يَمِينًا وَشِمَالًا، يَلْتَفِتُ إِلَيْهِمْ وَيَقُولُ: " السَّكِينَةَ أَيُّهَا النَّاسُ " ثُمَّ أَتَى جَمْعًا فَصَلَّى بِهِمِ الصَّلاتَيْنِ: الْمَغْرِبَ وَالْعِشَاءَ، ثُمَّ بَاتَ حَتَّى أَصْبَحَ، ثُمَّ أَتَى قُزَحَ، فَوَقَفَ عَلَى قُزَحَ، فَقَالَ: " هَذَا الْمَوْقِفُ، وَجَمْعٌ كُلُّهَا مَوْقِفٌ " ثُمَّ سَارَ حَتَّى أَتَى مُحَسِّرًا فَوَقَفَ عَلَيْهِ فَقَرَعَ نَاقَتَهُ، فَخَبَّتْ حَتَّى جَازَ الْوَادِيَ، ثُمَّ حَبَسَهَا، ثُمَّ أَرْدَفَ الْفَضْلَ، وَسَارَ حَتَّى أَتَى الْجَمْرَةَ فَرَمَاهَا، ثُمَّ أَتَى الْمَنْحَرَ، فَقَالَ: " هَذَا الْمَنْحَرُ، وَمِنًى كُلُّهَا مَنْحَرٌ " قَالَ: وَاسْتَفْتَتْهُ جَارِيَةٌ شَابَّةٌ مِنْ خَثْعَمَ فَقَالَتْ: إِنَّ أَبِي شَيْخٌ كَبِيرٌ قَدْ أَفْنَدَ وَقَدْ أَدْرَكَتْهُ فَرِيضَةُ اللهِ فِي الْحَجِّ، فَهَلْ يُجْزِئُ عَنْهُ أَنْ أُؤَدِّيَ عَنْهُ؟ قَالَ: " نَعَمْ، فَأَدِّي عَنْ أَبِيكِ " قَالَ: وَقَدْ لَوَى عُنُقَ الْفَضْلِ، فَقَالَ لَهُ الْعَبَّاسُ: يَا رَسُولَ اللهِ، لِمَ لَوَيْتَ عُنُقَ ابْنِ عَمِّكَ؟ قَالَ: " رَأَيْتُ شَابًّا وَشَابَّةً فَلَمْ آمَنِ الشَّيْطَانَ عَلَيْهِمَا " قَالَ: ثُمَّ جَاءَهُ رَجُلٌ، فَقَالَ: يَا رَسُولَ اللهِ، حَلَقْتُ قَبْلَ أَنْ أَنْحَرَ قَالَ: " انْحَرْ وَلا حَرَجَ ". ثُمَّ أَتَاهُ آخَرُ، فَقَالَ: يَا رَسُولَ اللهِ، إِنِّي أَفَضْتُ قَبْلَ أَنْ أَحْلِقَ، قَالَ: " احْلِقْ أَوْ قَصِّرْ وَلا حَرَجَ " ثُمَّ أَتَى الْبَيْتَ فَطَافَ بِهِ، ثُمَّ أَتَى زَمْزَمَ، فَقَالَ: " يَا بَنِي عَبْدِ الْمُطَّلِبِ، سِقَايَتَكُمْ، وَلَوْلا أَنْ يَغْلِبَكُمِ النَّاسُ عَلَيْهَا لَنَزَعْتُ بِهَا

إسناده حسن، عبد الرحمن بن الحارث: هو ابن عبد الله بن عياش بن أبي ربيعة المخزومي مختلف فيه، فقد وثّقه ابن سعد والعجلي، وذكره ابن حبان في "الثقات" وقال: كان من أهل العلم، وقال ابن معين: صالح، وفي رواية: ليس به بأس، وقال أبو حاتم: شيخ، وضعفه ابن المديني، وقال النسائي: ليس بالقوي، فمثله يكون حَسَنَ الحديثِ، وباقي رجاله ثقات رجال الشيخين غير زيد بن علي- وهو ابن الحسين بن علي- فقد روى له أصحاب السنن، وهو ثقة. سفيان: هو ابن سعيد الثوري
وأخرجه الترمذي (885) ، وأبو يعلى (312) و (544) ، وابن خزيمة (2837) و (2889) ، والطحاوي في "مشكل الآثار" 2/72-73، والبيهقي 5/122 من طريق أبي أحمد محمد بن عبد الله الزبيري، بهذا الإسناد. وبعضهم يزيد فيه على بعض. قال
الترمذي: حديث علي هذا حديث حسن صحيح، لا نعرفه من حديث علي إلا من هذا الوجه من حديث عبد الرحمن بن الحارث بن عياش
وأخرجه ابن الجارود (471) ، والبيهقي 5/122 من طريق محمد بن يوسف الفريابي، عن سفيان، به. وسيأتي برقم (564) و (613) و (768) و (1348)
قوله: "يُعنق"، العَنَق: ضرب من السير فيه سرعة وفسحة
وقُزح: هو القرن الذي يقف عنده الإمامُ بالمزدلفة
وخبَّتْ، أي: سارت الخَبَب، وهو ضرب من العَدْو
وأفند: تكلَّم بالفَنَد، وهو في الأصل: الكذب، ثم قالوا للشيخ إذا هَرِم: قد أفنَد، لأنه يتكلم بالمحرف من الكلام عن سنَن الصحة

حدثنا أبو أحمد محمد بن عبد الله بن الزبير، حدثنا سفيان، عن عبد الرحمن بن الحارث بن عياش بن أبي ربيعة، عن زيد بن علي، عن أبيه، عن عبيد الله بن أبي رافع، عن علي بن أبي طالب رضي الله عنه، قال: وقف رسول الله صلى الله عليه وسلم بعرفة فقال: " هذا الموقف، وعرفة كلها موقف " وأفاض حين غابت الشمس، ثم أردف أسامة، فجعل يعنق على بعيره، والناس يضربون يمينا وشمالا، يلتفت إليهم ويقول: " السكينة أيها الناس " ثم أتى جمعا فصلى بهم الصلاتين: المغرب والعشاء، ثم بات حتى أصبح، ثم أتى قزح، فوقف على قزح، فقال: " هذا الموقف، وجمع كلها موقف " ثم سار حتى أتى محسرا فوقف عليه فقرع ناقته، فخبت حتى جاز الوادي، ثم حبسها، ثم أردف الفضل، وسار حتى أتى الجمرة فرماها، ثم أتى المنحر، فقال: " هذا المنحر، ومنى كلها منحر " قال: واستفتته جارية شابة من خثعم فقالت: إن أبي شيخ كبير قد أفند وقد أدركته فريضة الله في الحج، فهل يجزئ عنه أن أؤدي عنه؟ قال: " نعم، فأدي عن أبيك " قال: وقد لوى عنق الفضل، فقال له العباس: يا رسول الله، لم لويت عنق ابن عمك؟ قال: " رأيت شابا وشابة فلم آمن الشيطان عليهما " قال: ثم جاءه رجل، فقال: يا رسول الله، حلقت قبل أن أنحر قال: " انحر ولا حرج ". ثم أتاه آخر، فقال: يا رسول الله، إني أفضت قبل أن أحلق، قال: " احلق أو قصر ولا حرج " ثم أتى البيت فطاف به، ثم أتى زمزم، فقال: " يا بني عبد المطلب، سقايتكم، ولولا أن يغلبكم الناس عليها لنزعت بها إسناده حسن، عبد الرحمن بن الحارث: هو ابن عبد الله بن عياش بن أبي ربيعة المخزومي مختلف فيه، فقد وثقه ابن سعد والعجلي، وذكره ابن حبان في "الثقات" وقال: كان من أهل العلم، وقال ابن معين: صالح، وفي رواية: ليس به بأس، وقال أبو حاتم: شيخ، وضعفه ابن المديني، وقال النسائي: ليس بالقوي، فمثله يكون حسن الحديث، وباقي رجاله ثقات رجال الشيخين غير زيد بن علي- وهو ابن الحسين بن علي- فقد روى له أصحاب السنن، وهو ثقة. سفيان: هو ابن سعيد الثوري وأخرجه الترمذي (885) ، وأبو يعلى (312) و (544) ، وابن خزيمة (2837) و (2889) ، والطحاوي في "مشكل الآثار" 2/72-73، والبيهقي 5/122 من طريق أبي أحمد محمد بن عبد الله الزبيري، بهذا الإسناد. وبعضهم يزيد فيه على بعض. قال الترمذي: حديث علي هذا حديث حسن صحيح، لا نعرفه من حديث علي إلا من هذا الوجه من حديث عبد الرحمن بن الحارث بن عياش وأخرجه ابن الجارود (471) ، والبيهقي 5/122 من طريق محمد بن يوسف الفريابي، عن سفيان، به. وسيأتي برقم (564) و (613) و (768) و (1348) قوله: "يعنق"، العنق: ضرب من السير فيه سرعة وفسحة وقزح: هو القرن الذي يقف عنده الإمام بالمزدلفة وخبت، أي: سارت الخبب، وهو ضرب من العدو وأفند: تكلم بالفند، وهو في الأصل: الكذب، ثم قالوا للشيخ إذا هرم: قد أفند، لأنه يتكلم بالمحرف من الكلام عن سنن الصحة

হাদিসের মানঃ হাসান (Hasan)
পুনঃনিরীক্ষণঃ
মুসনাদে আহমাদ
মুসনাদে আলী ইবনে আবি তালিব (রাঃ) [আলীর বর্ণিত হাদীস] (مسند علي بن أبي طالب)

পরিচ্ছেদঃ

৫৬৩। আলী (রাঃ) বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেনঃ ছেলে শিশুর পেশাবের ওপর পানি ছিটিয়ে দিতে হবে এবং মেয়ে শিশুর পেশাব ধুয়ে ফেলতে হবে।

কাতাদাহ বলেনঃ এ রকম হবে তখন পর্যন্ত, যখন পর্যন্ত তারা কোন শক্ত খাবার খায় না। শক্ত খাবার খেলে উভয়ের পেশাবে ধুতে হবে।

[ইবনু খুযাইমা-২৮৪, আবু দাউদ-৩৭৮, ইবনু মাজাহ-৫২৫, তিরমিযী-৬১০, মুসনাদ আহমাদ-৭৫৭, ১১৪৮, ১১৪৯]

حَدَّثَنَا عَبْدُ الصَّمَدِ بْنُ عَبْدِ الْوَارِثِ، حَدَّثَنَا هِشَامٌ، عَنْ قَتَادَةَ، عَنْ أَبِي حَرْبِ بْنِ أَبِي الْأَسْوَدِ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ عَلِيٍّ، قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: " بَوْلُ الْغُلامِ يُنْضَحُ عَلَيْهِ، وَبَوْلُ الْجَارِيَةِ يُغْسَلُ " قَالَ قَتَادَةُ: " هَذَا مَا لَمْ يَطْعَمَا فَإِذَا طَعِمَا غُسِلَ بَوْلُهُمَا

إسناده صحيح على شرط مسلم، رجاله ثقات رجال الشيخين غير أبي حرب بن أبي الأسود، فمن رجال مسلم. وقال الحافظ في "التلخيص الحبير" 1/38: إسناده صحيح، إلا أنه اختلف في رفعه ووقفه، وفي وصله وإرساله، وقد رجح البخاري صحته، وكذا الدارقطني، وصحح إسناد المرفوع في "الفتح" 1/326، قال عن الرواية الموقوفة: وليس ذلك بعلة قادحة. وانظر "العلل الكبير" 1/142، للترمذي
وأخرجه الدارقطني 1/129 من طريق عبد الصمد بن عبد الوارث، بهذا الإسناد
وأخرجه أبو داود (377) ، ومن طريقه البيهقي 2/415 من طريق سعيد بن أبي عَروبة، عن قتادة، عن أبي حرب، عن أبيه، عن علي موقوفا
وأخرجه ابن أبي شيبة 1/121، وعبد الرزاق (1488) من طريق سعيد، عن قتادة، عن أبي حرب، عن علي موقوفا
وأخرجه البيهقي 2/415 من طريق مسلم بن إبراهيم، عن هشام، عن قتادة، عن ابن أبي الأسود، عن أبيه، عن رسول الله صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، مرسل. وسيأتي الحديث برقم (757) و (1148) و (1149)
وفي الباب عن عائشة وعن أم الفضل وعن أم قيس بنت محصن، وسترد في "المسند" على التوالي 2/56 و339 و355، وعن أبي السمح عند أبي داود (376) ، وابن ماجه (526) ، والنسائي 1/158

حدثنا عبد الصمد بن عبد الوارث، حدثنا هشام، عن قتادة، عن أبي حرب بن أبي الأسود، عن أبيه، عن علي، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: " بول الغلام ينضح عليه، وبول الجارية يغسل " قال قتادة: " هذا ما لم يطعما فإذا طعما غسل بولهما إسناده صحيح على شرط مسلم، رجاله ثقات رجال الشيخين غير أبي حرب بن أبي الأسود، فمن رجال مسلم. وقال الحافظ في "التلخيص الحبير" 1/38: إسناده صحيح، إلا أنه اختلف في رفعه ووقفه، وفي وصله وإرساله، وقد رجح البخاري صحته، وكذا الدارقطني، وصحح إسناد المرفوع في "الفتح" 1/326، قال عن الرواية الموقوفة: وليس ذلك بعلة قادحة. وانظر "العلل الكبير" 1/142، للترمذي وأخرجه الدارقطني 1/129 من طريق عبد الصمد بن عبد الوارث، بهذا الإسناد وأخرجه أبو داود (377) ، ومن طريقه البيهقي 2/415 من طريق سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، عن أبي حرب، عن أبيه، عن علي موقوفا وأخرجه ابن أبي شيبة 1/121، وعبد الرزاق (1488) من طريق سعيد، عن قتادة، عن أبي حرب، عن علي موقوفا وأخرجه البيهقي 2/415 من طريق مسلم بن إبراهيم، عن هشام، عن قتادة، عن ابن أبي الأسود، عن أبيه، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم، مرسل. وسيأتي الحديث برقم (757) و (1148) و (1149) وفي الباب عن عائشة وعن أم الفضل وعن أم قيس بنت محصن، وسترد في "المسند" على التوالي 2/56 و339 و355، وعن أبي السمح عند أبي داود (376) ، وابن ماجه (526) ، والنسائي 1/158

হাদিসের মানঃ সহিহ (Sahih)
পুনঃনিরীক্ষণঃ
মুসনাদে আহমাদ
মুসনাদে আলী ইবনে আবি তালিব (রাঃ) [আলীর বর্ণিত হাদীস] (مسند علي بن أبي طالب)

পরিচ্ছেদঃ

৫৬৪। আলী ইবনে আবী তালিব (রাঃ) থেকে বর্ণিত আছে যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আরাফাতে অবস্থান করলেন। তখন তার পেছনে উসামা বিন যায়িদ উপবিষ্ট ছিলেন। তিনি বললেনঃ এটা অবস্থানের জায়গা এবং সমগ্ৰ আরাফাতই অবস্থানের জায়গা। তারপর উটনীকে ধাক্কা দিলেন এবং জোরে জোরে চলতে লাগলেন। লোকেরা তার ডান পাশে ও বামপাশে চলতে লাগলেন। তিনি তাদের দিকে তাকিয়ে বলতে লাগলেন, প্রশান্তি হে জনতা, প্রশান্তি হে জনতা। অবশেষে তিনি মুযদালফায় এলেন এবং দুই নামায একত্রিত করলেন। তারপর মুযদালিফায় অবস্থান করলেন। তিনি কুযাহ নামক স্থানে অবস্থান করলেন এবং ফযল ইবনে আব্বাসকে পেছনে বসালেন। তিনি বললেনঃ এটা অবস্থানের স্থান এবং সমগ্র মুযদালফাই অবস্থানের স্থান। এরপর উটনীকে ধাক্কা দিয়ে জোরে জোরে চলতে লাগলেন এবং অন্য লোকেরা ডানে ও বামে চলতে লাগলো। তিনি তাদের দিকে তাকিয়ে বলতে লাগলেনঃ হে জনতা, প্রশান্তি, প্রশান্তি। অবশেষে তিনি মুহাস্‌সারে এলেন এবং বাহক জন্তুটিকে ধাক্কা দিয়ে জোরে জোরে চালিয়ে মুহাসসার থেকে বেরিয়ে গেলেন।

তারপর পুনরায় তাঁর প্রথম অভিযানে প্রত্যাবর্তন করলেন (অর্থাৎ নতুনভাবে যাত্রা শুরু করলেন) এবং শেষ পর্যন্ত জামরায় পাথর নিক্ষেপ করলেন। তারপর কুরবানীর জায়গায় এলেন। বললেনঃ এটা কুরবানীর জায়গা এবং সমগ্ৰ মিনা কুরবানীর জায়গা। তারপর খাসিয়াম গোত্রের এক যুবতী মহিলা তাঁর কাছে এল। সে বললোঃ আমার আব্বা বৃদ্ধ এবং চলাফেরায় অক্ষম। অথচ তাঁর ওপর হজ্জ ফরয হয়ে আছে। কিন্তু তার হজ্জ করার ক্ষমতা নেই। তাঁর পক্ষ থেকে আমি হজ্জ করলে কি আদায় হবে? রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেনঃ হ্যাঁ এবং তিনি মহিলার দিক থেকে ফযল ইবনে আব্বাসের মুখ সরিয়ে দিতে লাগলেন।

তারপর তার কাছে এক ব্যক্তি এল। সে বললোঃ আমি জামরায় পাথর নিক্ষেপ করেছি, আরাফাত থেকে ফিরে এসেছি, (ইহরাম খুলে স্বাভাবিক) পোশাক পরেছি, কিন্তু চুল কামাইনি। তিনি বললেনঃ কোন ক্ষতি নেই। এখন চুল কামাও। তারপর তাঁর কাছে আরেক ব্যক্তি এল। সে বললোঃ আমি পাথর নিক্ষেপ করেছি, চুল কামিয়েছি, পোশাক পরেছি, কিন্তু কুরবানী করিনি। তিনি বললেনঃ কোন ক্ষতি নেই, এখন কুরবানী কর। তারপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ফিরে চললেন। তিনি এক বালতি যমযমের পানি আনতে বললেন, তা থেকে কিছু পান করলেন এবং কিছু দিয়ে ওযূ করলেন। তারপর বললেনঃ হে আবদুল মুত্তালিবের গোত্ৰ, তোমরা পানি তোল। যদি আশঙ্কা না থাকতো যে, তোমরা পরাভূত হবে, তাহলে আমি পানি তুলতাম। (অর্থাৎ আমি তুললে কুয়ায় এত ভীড় হতো যে, তোমরা হয়তো পানি তোলার সুযোগ পেতে না)। আবান বললেনঃ হে আল্লাহর রাসূল, আমি দেখেছি, আপনি আপনার চাচাতো ভাইয়ের মুখ ঘুরিয়ে দিচ্ছিলেন। তিনি বললেনঃ আমি দেখলাম, একজন যুবক এবং একজন যুবতী কাছাকাছি রয়েছে। তাই আমার আশঙ্কা ছিল ওদেরকে শয়তান কুপ্ররোচনা দেয়। কিনা। [হাদীস নং-৫৬২]

حَدَّثَنَا عَبْدُ اللهِ، حَدَّثَنِي أَحْمَدُ بْنُ عَبْدَةَ الْبَصْرِيُّ، حَدَّثَنَا الْمُغِيرَةُ بْنُ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ الْحَارِثِ الْمَخْزُومِيُّ، حَدَّثَنِي أَبِي عَبْدُ الرَّحْمَنِ بْنُ الْحَارِثِ، عَنْ زَيْدِ بْنِ عَلِيِّ بْنِ حُسَيْنِ بْنِ عَلِيٍّ، عَنْ أَبِيهِ عَلِيِّ بْنِ حُسَيْنٍ، عَنْ عُبَيْدِ اللهِ بْنِ أَبِي رَافِعٍ، مَوْلَى رَسُولِ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ عَنْ عَلِيِّ بْنِ أَبِي طَالِبٍ رَضِيَ اللهُ عَنْهُ، أَنَّ النَّبِيَّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ وَقَفَ بِعَرَفَةَ وَهُوَ مُرْدِفٌ أُسَامَةَ بْنَ زَيْدٍ فَقَالَ: " هَذَا الْمَوْقِفُ وَكُلُّ عَرَفَةَ مَوْقِفٌ " ثُمَّ دَفَعَ يَسِيرُ الْعَنَقَ وَجَعَلَ النَّاسُ يَضْرِبُونَ يَمِينًا وَشِمَالًا، وَهُوَ يَلْتَفِتُ وَيَقُولُ: السَّكِينَةَ أَيُّهَا النَّاسُ السَّكِينَةَ أَيُّهَا النَّاسُ " حَتَّى جَاءَ الْمُزْدَلِفَةَ، وَجَمَعَ بَيْنَ الصَّلاتَيْنِ، ثُمَّ وَقَفَ بِالْمُزْدَلِفَةِ، فَوَقَفَ عَلَى قُزَحَ، وَأَرْدَفَ الْفَضْلَ بْنَ عَبَّاسٍ، وَقَالَ: هَذَا الْمَوْقِفُ، وَكُلُّ الْمُزْدَلِفَةِ مَوْقِفٌ " ثُمَّ دَفَعَ وَجَعَلَ يَسِيرُ الْعَنَقَ، وَالنَّاسُ يَضْرِبُونَ يَمِينًا وَشِمَالًا، وَهُوَ يَلْتَفِتُ وَيَقُولُ: " السَّكِينَةَ السَّكِينَةَ أَيُّهَا النَّاسُ " حَتَّى جَاءَ مُحَسِّرًا فَقَرَعَ رَاحِلَتَهُ فَخَبَّتْ، حَتَّى خَرَجَ، ثُمَّ عَادَ لِسَيْرِهِ الْأَوَّلِ، حَتَّى رَمَى الْجَمْرَةَ، ثُمَّ جَاءَ الْمَنْحَرَ فَقَالَ: " هَذَا الْمَنْحَرُ، وَكُلُّ مِنًى مَنْحَرٌ " ثُمَّ جَاءَتْهُ امْرَأَةٌ شَابَّةٌ مِنْ خَثْعَمَ، فَقَالَتْ: إِنَّ أَبِي شَيْخٌ كَبِيرٌ، وَقَدْ أَفْنَدَ، وَأَدْرَكَتْهُ فَرِيضَةُ اللهِ فِي الْحَجِّ، وَلا يَسْتَطِيعُ أَدَاءَهَا، فَيُجْزِئُ عَنْهُ أَنْ أُؤَدِّيَهَا عَنْهُ؟ قَالَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: نَعَمْ ، وَجَعَلَ يَصْرِفُ وَجْهَ الْفَضْلِ بْنِ الْعَبَّاسِ عَنْهَا. ثُمَّ أَتَاهُ رَجُلٌ فَقَالَ: إِنِّي رَمَيْتُ الْجَمْرَةَ، وَأَفَضْتُ وَلَبِسْتُ وَلَمْ أَحْلِقْ. قَالَ: " فَلا حَرَجَ، فَاحْلِقْ " ثُمَّ أَتَاهُ رَجُلٌ آخَرُ، فَقَالَ: إِنِّي رَمَيْتُ وَحَلَقْتُ وَلَبِسْتُ وَلَمْ أَنْحَرْ فَقَالَ: " لَا حَرَجَ فَانْحَرْ " ثُمَّ أَفَاضَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، فَدَعَا بِسَجْلٍ مِنْ مَاءِ زَمْزَمَ، فَشَرِبَ مِنْهُ وَتَوَضَّأَ، ثُمَّ قَالَ: " انْزِعُوا يَا بَنِي عَبْدِ الْمُطَّلِبِ، فَلَوْلا أَنْ تُغْلَبُوا عَلَيْهَا لَنَزَعْتُ " قَالَ الْعَبَّاسُ: يَا رَسُولَ اللهِ إِنِّي رَأَيْتُكَ تَصْرِفُ وَجْهَ ابْنِ أَخِيكَ؟ قَالَ: إِنِّي رَأَيْتُ غُلامًا شَابًّا، وَجَارِيَةً شَابَّةً، فَخَشِيتُ عَلَيْهِمَا الشَّيْطَانَ

إسناده حسن. وهو مكرر (525) . وأخرجه البزار (532) عن أحمد بن عبدة، بهذا الإسناد. وانظر (562)

حدثنا عبد الله، حدثني أحمد بن عبدة البصري، حدثنا المغيرة بن عبد الرحمن بن الحارث المخزومي، حدثني أبي عبد الرحمن بن الحارث، عن زيد بن علي بن حسين بن علي، عن أبيه علي بن حسين، عن عبيد الله بن أبي رافع، مولى رسول الله صلى الله عليه وسلم عن علي بن أبي طالب رضي الله عنه، أن النبي صلى الله عليه وسلم وقف بعرفة وهو مردف أسامة بن زيد فقال: " هذا الموقف وكل عرفة موقف " ثم دفع يسير العنق وجعل الناس يضربون يمينا وشمالا، وهو يلتفت ويقول: السكينة أيها الناس السكينة أيها الناس " حتى جاء المزدلفة، وجمع بين الصلاتين، ثم وقف بالمزدلفة، فوقف على قزح، وأردف الفضل بن عباس، وقال: هذا الموقف، وكل المزدلفة موقف " ثم دفع وجعل يسير العنق، والناس يضربون يمينا وشمالا، وهو يلتفت ويقول: " السكينة السكينة أيها الناس " حتى جاء محسرا فقرع راحلته فخبت، حتى خرج، ثم عاد لسيره الأول، حتى رمى الجمرة، ثم جاء المنحر فقال: " هذا المنحر، وكل منى منحر " ثم جاءته امرأة شابة من خثعم، فقالت: إن أبي شيخ كبير، وقد أفند، وأدركته فريضة الله في الحج، ولا يستطيع أداءها، فيجزئ عنه أن أؤديها عنه؟ قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: نعم ، وجعل يصرف وجه الفضل بن العباس عنها. ثم أتاه رجل فقال: إني رميت الجمرة، وأفضت ولبست ولم أحلق. قال: " فلا حرج، فاحلق " ثم أتاه رجل آخر، فقال: إني رميت وحلقت ولبست ولم أنحر فقال: " لا حرج فانحر " ثم أفاض رسول الله صلى الله عليه وسلم، فدعا بسجل من ماء زمزم، فشرب منه وتوضأ، ثم قال: " انزعوا يا بني عبد المطلب، فلولا أن تغلبوا عليها لنزعت " قال العباس: يا رسول الله إني رأيتك تصرف وجه ابن أخيك؟ قال: إني رأيت غلاما شابا، وجارية شابة، فخشيت عليهما الشيطان إسناده حسن. وهو مكرر (525) . وأخرجه البزار (532) عن أحمد بن عبدة، بهذا الإسناد. وانظر (562)

হাদিসের মানঃ হাসান (Hasan)
পুনঃনিরীক্ষণঃ
মুসনাদে আহমাদ
মুসনাদে আলী ইবনে আবি তালিব (রাঃ) [আলীর বর্ণিত হাদীস] (مسند علي بن أبي طالب)

পরিচ্ছেদঃ

৫৬৫। আলী (রাঃ) থেকে বর্ণিত। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন কোন রোগীর জন্য আল্লাহর আশ্রয় প্রার্থনা করতেন, তখন বলতেনঃ

أَذْهِبِ الْبَأْسَ رَبَّ النَّاسِ، اشْفِ أَنْتَ الشَّافِي لَا شِفَاءَ إِلا شِفَاؤُكَ، شِفَاءً لَا يُغَادِرُ سَقَمًا

“(হে মানুষের প্রভু, দুঃখ কষ্ট দূর করে দাও, তুমি আরোগ্য দান কর, তুমিই তো আরোগ্য দাতা, তোমার আরোগ্য দান ব্যতীত আরোগ্য লাভ করা সম্ভব নয়, তুমি এমন আরোগ্য দিয়ে থাক, যার পর আর কোন রোগ-ব্যাধি থাকে না।)”

[তিরমিযী-৩৫৬৫]

حَدَّثَنَا أَبُو سَعِيدٍ، مَوْلَى بَنِي هَاشِمٍ حَدَّثَنَا إِسْرَائِيلُ، حَدَّثَنَا أَبُو إِسْحَاقَ، عَنِ الْحَارِثِ، عَنْ عَلِيٍّ قَالَ: كَانَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ إِذَا عَوَّذَ مَرِيضًا، قَالَ: أَذْهِبِ الْبَأْسَ رَبَّ النَّاسِ، اشْفِ أَنْتَ الشَّافِي لَا شِفَاءَ إِلا شِفَاؤُكَ، شِفَاءً لَا يُغَادِرُ سَقَمًا

حسن لغيره وهذا إسناد ضعيف، الحارث- وهو ابنُ عبد الله الأعور الهَمْدَاني صاحب علي- ضعفوه
وأخرجه عبدُ بن حميد (66) ، والترمذي (3565) ، والبزارُ (847) من طرق عن إسرائيل، بهذا الإسناد. قال الترمذي: حديث حسن
وأخرجه ابن أبي شيبة 8/47 و10/313 عن أبي الأحوص، عن أبي إسحاق، به
قلنا: ومتنُ الحديث قد صَحّ من حديث عائشة عند البخاري (5743) ، ومسلم (2191) ومن حديث ابن مسعود عند أبي داود (3883)
ومن حديث أنس بن مالك عند البخاري (5742) ، وأبي داود (3890) ، والترمذي (973)
والبأس: الشدة والألم
وقوله: "لا يغادر سقماً"، أي: لا يترك سقماً، وهو المرض

حدثنا أبو سعيد، مولى بني هاشم حدثنا إسرائيل، حدثنا أبو إسحاق، عن الحارث، عن علي قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا عوذ مريضا، قال: أذهب البأس رب الناس، اشف أنت الشافي لا شفاء إلا شفاؤك، شفاء لا يغادر سقما حسن لغيره وهذا إسناد ضعيف، الحارث- وهو ابن عبد الله الأعور الهمداني صاحب علي- ضعفوه وأخرجه عبد بن حميد (66) ، والترمذي (3565) ، والبزار (847) من طرق عن إسرائيل، بهذا الإسناد. قال الترمذي: حديث حسن وأخرجه ابن أبي شيبة 8/47 و10/313 عن أبي الأحوص، عن أبي إسحاق، به قلنا: ومتن الحديث قد صح من حديث عائشة عند البخاري (5743) ، ومسلم (2191) ومن حديث ابن مسعود عند أبي داود (3883) ومن حديث أنس بن مالك عند البخاري (5742) ، وأبي داود (3890) ، والترمذي (973) والبأس: الشدة والألم وقوله: "لا يغادر سقما"، أي: لا يترك سقما، وهو المرض

হাদিসের মানঃ হাসান (Hasan)
পুনঃনিরীক্ষণঃ
মুসনাদে আহমাদ
মুসনাদে আলী ইবনে আবি তালিব (রাঃ) [আলীর বর্ণিত হাদীস] (مسند علي بن أبي طالب)

পরিচ্ছেদঃ

৫৬৬। আলী (রাঃ) থেকে বৰ্ণিত। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেনঃ আমি যদি মুসলিমদের সাথে পরামর্শ ব্যতীত কাউকে আমীর নিযুক্ত করতাম, তবে ইবনে উম্মু আবদকে করতাম।

[ইবনু মাজাহ-১৩৭, তিরমিযী-৩৮০৮, ৩৮০৯, মুসনাদে আহমাদ-৭৩৯, ৮৪৬, ৮৫২]

حَدَّثَنَا أَبُو سَعِيدٍ، حَدَّثَنَا إِسْرَائِيلُ، حَدَّثَنَا أَبُو إِسْحَاقَ، عَنِ الْحَارِثِ، عَنْ عَلِيٍّ قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: " لَوْ كُنْتُ مُؤَمِّرًا أَحَدًا دُونَ مَشُورَةِ الْمُؤْمِنِينَ، لَأَمَّرْتُ ابْنَ أُمِّ عَبْدٍ

إسناده ضعيف لضعف الحارث الأعور
وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 3/154، ويعقوب بن سفيان في "المعرفة" 2/534، والبزار (852) من طريق عبيد الله بن موسى، عن إسرائيل، بهذا الإسناد. قرن يعقوب في روايته بعبيد اللُه بن موسى عبدَ الله بن رجاء. وسيأتي برقم (739) و (846) و (852)
وابن أم عبدٍ: هو عبد الله بن مسعود

حدثنا أبو سعيد، حدثنا إسرائيل، حدثنا أبو إسحاق، عن الحارث، عن علي قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: " لو كنت مؤمرا أحدا دون مشورة المؤمنين، لأمرت ابن أم عبد إسناده ضعيف لضعف الحارث الأعور وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 3/154، ويعقوب بن سفيان في "المعرفة" 2/534، والبزار (852) من طريق عبيد الله بن موسى، عن إسرائيل، بهذا الإسناد. قرن يعقوب في روايته بعبيد الله بن موسى عبد الله بن رجاء. وسيأتي برقم (739) و (846) و (852) وابن أم عبد: هو عبد الله بن مسعود

হাদিসের মানঃ যঈফ (Dai'f)
পুনঃনিরীক্ষণঃ
মুসনাদে আহমাদ
মুসনাদে আলী ইবনে আবি তালিব (রাঃ) [আলীর বর্ণিত হাদীস] (مسند علي بن أبي طالب)

পরিচ্ছেদঃ

৫৬৭। আমর ইবনে সুলাইমের মাতা বলেন, (হজ্জের মাওসুমে) আমরা যখন মিনায় অবস্থান করছিলাম, তখন আলী ইবনে আবি তালিব (রাঃ) বলতে লাগলেনঃ রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন যে, এই দিনগুলো (১০-১৩ জিলহজ) পানাহারের দিন। এ দিনগুলোতে তোমাদের কেউ যেন রোযা না রাখে। অতঃপর তিনি তাঁর উটে চড়ে এই ঘোষণা দিতে দিতে জনগণের অনুসরণ করতে লাগলেন। [হাদীস নং-৭০৮, ৮২১, ৮২৪, ৯৯২]

حَدَّثَنَا أَبُو سَعِيدٍ، حَدَّثَنَا سَعِيدُ بْنُ سَلَمَةَ بْنِ أَبِي الْحُسَامِ، - مَدَنِيٌّ مَوْلًى لِآلِ عُمَرَ - حَدَّثَنَا يَزِيدُ بْنُ عَبْدِ اللهِ بْنِ الْهَادِ عَنْ عَمْرِو بْنِ سُلَيْمٍ عَنْ أُمِّهِ، قَالَتْ: بَيْنَمَا نَحْنُ بِمِنًى إِذَا عَلِيُّ بْنُ أَبِي طَالِبٍ رَضِيَ اللهُ عَنْهُ، يَقُولُ: إِنَّ رَسُولَ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، قَالَ: " إِنَّ هَذِهِ أَيَّامُ أَكْلٍ وَشُرْبٍ، فَلا يَصُومُهَا أَحَدٌ " وَاتَّبَعَ النَّاسَ عَلَى جَمَلِهِ يَصْرُخُ بِذَلِكَ

حديث صحيح، رجالُه ثقات رجالُ الصحيح غَيْرَ أم عمرو بن سليم، وهي صحابية سماها ابنُ سعد في "الطبقات" 5/72 في ترجمة ابنها عمرو بن سليم: النوار بنت عبد الله بن الحارث بن جَماز، وعامةُ من ألف في الصحابة إنما ذكروها في قسم
الكُنى. وانظر ما سيأتي برقم (821) و (824)
وقوله: "فلا يصومها"، قال أبو البقاء في "إعراب الحديث" ص154-155، ونقله عنه السيوطي في "عقود الزبرجد" 1/280: كذا وقع في هذه الرواية، والوجه "فلا يَصُمْها" أو "فلا يصومنّها"، ووجه هذه الرواية أن تُضم الميم، ويكون لفظه لفظ الخبر، ومعناه الأمر، كقوله تعالى: (والمطلَّقاتُ يتربَّصْن) ، (والوالداتُ يُرضِعْنَ)

حدثنا أبو سعيد، حدثنا سعيد بن سلمة بن أبي الحسام، - مدني مولى لآل عمر - حدثنا يزيد بن عبد الله بن الهاد عن عمرو بن سليم عن أمه، قالت: بينما نحن بمنى إذا علي بن أبي طالب رضي الله عنه، يقول: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم، قال: " إن هذه أيام أكل وشرب، فلا يصومها أحد " واتبع الناس على جمله يصرخ بذلك حديث صحيح، رجاله ثقات رجال الصحيح غير أم عمرو بن سليم، وهي صحابية سماها ابن سعد في "الطبقات" 5/72 في ترجمة ابنها عمرو بن سليم: النوار بنت عبد الله بن الحارث بن جماز، وعامة من ألف في الصحابة إنما ذكروها في قسم الكنى. وانظر ما سيأتي برقم (821) و (824) وقوله: "فلا يصومها"، قال أبو البقاء في "إعراب الحديث" ص154-155، ونقله عنه السيوطي في "عقود الزبرجد" 1/280: كذا وقع في هذه الرواية، والوجه "فلا يصمها" أو "فلا يصومنها"، ووجه هذه الرواية أن تضم الميم، ويكون لفظه لفظ الخبر، ومعناه الأمر، كقوله تعالى: (والمطلقات يتربصن) ، (والوالدات يرضعن)

হাদিসের মানঃ সহিহ (Sahih)
পুনঃনিরীক্ষণঃ
মুসনাদে আহমাদ
মুসনাদে আলী ইবনে আবি তালিব (রাঃ) [আলীর বর্ণিত হাদীস] (مسند علي بن أبي طالب)

পরিচ্ছেদঃ

৫৬৮। আলী (রাঃ) থেকে বর্ণিত। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেনঃ যে ব্যক্তি তার স্বপ্ন সম্পর্কে মিথ্যা ও মনগড়া কাহিনী বলবে, কিয়ামতের দিন তাকে একটি যবের দানায় গিরা লাগাতে বাধ্য করা হবে।

[তিরমিযী ২২৮১, ২২৮২, মুসনাদে আহমাদ ৬৯৪, ৬৯৯, ৭৮৯, ১০৭০, ১০৮৮, ১০৮৯]

حَدَّثَنَا أَبُو سَعِيدٍ، حَدَّثَنَا إِسْرَائِيلُ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الْأَعْلَى، عَنْ أَبِي عَبْدِ الرَّحْمَنِ، عَنْ عَلِيٍّ رَضِيَ اللهُ عَنْهُ، وَرَفَعَهُ قَالَ: مَنْ كَذَبَ فِي حُلْمِهِ، كُلِّفَ عَقْدَ شَعِيرَةٍ يَوْمَ الْقِيَامَةِ

حسن لغيره، وهذا إسناد ضعيف لضعف عبد الأعلى- وهو ابن عامر الثعلبي
وأخرجه عبد بن حميد (86) عن أبي نعيم، والبزار (595) من طريق عبيد الله بن موسى، كلاهما عن إسرائيل، بهذا الإسناد. وسيأتي برقم (694) و (699) و (789) و (1070) و (1088) و (1089)
وله شاهد من حديث ابن عباس عند البخاري (7042) بلفظ: "من تحلَّم بحُلْم لم يَرَهُ، كُلِّف أن يَعقِدَ بين شعيرتين ولن يفعلَ". وسيأتي تخريجه في "المسند" برقم (1866)
وفي معنى الحديث قال السندي: أي: كَما أنه نَظَم غير المنظوم، وعَقَد بين الكلمات غير المرتبطة أصلاً، كذلك يُكَلف بالعقد في شيء لا يقبله، ليكونَ العقابُ من جنس المعصية، ثم معلوم أنه لا يَعقِدُ أصلاً، وقد جاء به الروايات، فيمتدُّ عقابه بهذا
التكليف إلى ما شاء الله، أو يدومُ إن كان كافراً، قيل: إنما زيد في عقوبته مع أن كَذِبَه في المنام لا يزيد على كذبه في اليقظة، لأن الرؤيا بحكم الحديث جزء من النبوة، وهي وحي، فالكذب فيه كذب على الله، وهو أعظم من الكذب على الخلق أو على نفسه

حدثنا أبو سعيد، حدثنا إسرائيل، حدثنا عبد الأعلى، عن أبي عبد الرحمن، عن علي رضي الله عنه، ورفعه قال: من كذب في حلمه، كلف عقد شعيرة يوم القيامة حسن لغيره، وهذا إسناد ضعيف لضعف عبد الأعلى- وهو ابن عامر الثعلبي وأخرجه عبد بن حميد (86) عن أبي نعيم، والبزار (595) من طريق عبيد الله بن موسى، كلاهما عن إسرائيل، بهذا الإسناد. وسيأتي برقم (694) و (699) و (789) و (1070) و (1088) و (1089) وله شاهد من حديث ابن عباس عند البخاري (7042) بلفظ: "من تحلم بحلم لم يره، كلف أن يعقد بين شعيرتين ولن يفعل". وسيأتي تخريجه في "المسند" برقم (1866) وفي معنى الحديث قال السندي: أي: كما أنه نظم غير المنظوم، وعقد بين الكلمات غير المرتبطة أصلا، كذلك يكلف بالعقد في شيء لا يقبله، ليكون العقاب من جنس المعصية، ثم معلوم أنه لا يعقد أصلا، وقد جاء به الروايات، فيمتد عقابه بهذا التكليف إلى ما شاء الله، أو يدوم إن كان كافرا، قيل: إنما زيد في عقوبته مع أن كذبه في المنام لا يزيد على كذبه في اليقظة، لأن الرؤيا بحكم الحديث جزء من النبوة، وهي وحي، فالكذب فيه كذب على الله، وهو أعظم من الكذب على الخلق أو على نفسه

হাদিসের মানঃ হাসান (Hasan)
পুনঃনিরীক্ষণঃ
মুসনাদে আহমাদ
মুসনাদে আলী ইবনে আবি তালিব (রাঃ) [আলীর বর্ণিত হাদীস] (مسند علي بن أبي طالب)

পরিচ্ছেদঃ

৫৬৯। আলী (রাঃ) থেকে বৰ্ণিত। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ফজরের দু’রাকাআত (সুন্নাত) নামায ইকামাতের সময় (অর্থাৎ পূর্ব মুহুর্তে) পড়তেন।

[ইবনু মাজাহ-১১৪৭, মুসনাদে আহমাদ-৬৫৯, ৭৬৪, ৮৮৪, ৯২৯]

حَدَّثَنَا أَبُو سَعِيدٍ، وَحُسَيْنُ بْنُ مُحَمَّدٍ، قَالا: حَدَّثَنَا إِسْرَائِيلُ، عَنْ أَبِي إِسْحَاقَ، عَنِ الْحَارِثِ، عَنْ عَلِيٍّ، قَالَ: " كَانَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: يُصَلِّي رَكْعَتَيِ الْفَجْرِ عِنْدَ الْإِقَامَةِ

إسناده ضعيف لضعف الحارث- وهو ابن عبد الله الأعور. وأخرجه البزار (856) من طريق أبي عامر العقدي، عن إسرائيل، بهذا الإِسناد
وأخرجه عبد الرزاق (4772) عن إسرائيل، بهذا الإسناد. وسيأتي برقم (659) و (764) و (884) و (929)

حدثنا أبو سعيد، وحسين بن محمد، قالا: حدثنا إسرائيل، عن أبي إسحاق، عن الحارث، عن علي، قال: " كان رسول الله صلى الله عليه وسلم: يصلي ركعتي الفجر عند الإقامة إسناده ضعيف لضعف الحارث- وهو ابن عبد الله الأعور. وأخرجه البزار (856) من طريق أبي عامر العقدي، عن إسرائيل، بهذا الإسناد وأخرجه عبد الرزاق (4772) عن إسرائيل، بهذا الإسناد. وسيأتي برقم (659) و (764) و (884) و (929)

হাদিসের মানঃ যঈফ (Dai'f)
পুনঃনিরীক্ষণঃ
মুসনাদে আহমাদ
মুসনাদে আলী ইবনে আবি তালিব (রাঃ) [আলীর বর্ণিত হাদীস] (مسند علي بن أبي طالب)

পরিচ্ছেদঃ

৫৭০। আলী (রাঃ) বলেছেন, আমার জন্য শেষ রাতের একটা সময় নির্দিষ্ট ছিল, যখন আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট যেতাম। তিনি যদি তখন নামাযে থাকতেন, তবে তিনি আমার আগমন উপলক্ষে সুবহানাল্লাহ পড়তেন, সেটা হতো আমার জন্য প্রবেশের অনুমতি। আর যদি নামাযে না থাকতেন তাহলে আমাকে অনুমতি দিতেন।

[ইবনু খুযাইমা-৯০৪, ৯০২, নাসায়ী-১২/৩, ইবনু মাজাহ-৩৭০৮, মুসনাদে আহমাদ-৬০৮, ৬৪৭, ৮৪৫, ১২৯০]

حَدَّثَنَا أَبُو سَعِيدٍ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الْوَاحِدِ بْنُ زِيَادٍ الثَّقَفِيُّ، حَدَّثَنَا عُمَارَةُ بْنُ الْقَعْقَاعِ، عَنِ الْحَارِثِ بْنِ يَزِيدَ الْعُكْلِيِّ، عَنْ أَبِي زُرْعَةَ، عَنْ عَبْدِ اللهِ بْنِ نُجَيٍّ، قَالَ: قَالَ عَلِيٌّ: كَانَتْ لِي سَاعَةٌ مِنَ السَّحَرِ أَدْخُلُ فِيهَا عَلَى رَسُولِ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فَإِنْ كَانَ قَائِمًا يُصَلِّي، سَبَّحَ بِي، فَكَانَ ذَاكَ إِذْنُهُ لِي، وَإِنْ لَمْ يَكُنْ يُصَلِّي أَذِنَ لِي

إسناده ضعيف، عبد الله بن نجي مختلف فيه، وثقه النسائي وابن حبان، وقال الحاكم بإثر حديث في "المستدرك" 1/171: من ثقات الكوفيين، ووافقه الذهبي، وقال البخاري وابن عدي: فيه نظر، وقال الدارقطني: ليس بالقوي في الحديث، وقال
الشافعي: مجهول، ثم إنه لم يسمع من علي، بينه وبينه أبوه فيما قاله ابن معين، وباقي رجاله ثقات رجال الشيخين غير أبي سعيد مولى بني هاشم- واسمه عبد الرحمن بن عبد الله-، فمن رجال البخاري. أبو زرعة: هو ابن عمرو بن جرير بن عبد الله البجلي الكوفي، قيل: اسمه هرم، وقيل: عمرو، وقيل: عبد الله، وقيل: عبد الرحمن، وقيل: جرير
وأخرجه البزار (882) عن أبي كامل، وابن خزيمة (904) من طريق معلى بن أسد، كلاهما عن عبد الواحد بن زياد، بهذا الإسناد. وسقط من رواية البزار الحارث العكلي، وفيه "تنحنح". وسيأتي برقم (608) و (845) و (1289) ، وأيضاً برقم (647) من طريق عبد الله بن نجي، عن أبيه، عن علي. وانظر (598)

حدثنا أبو سعيد، حدثنا عبد الواحد بن زياد الثقفي، حدثنا عمارة بن القعقاع، عن الحارث بن يزيد العكلي، عن أبي زرعة، عن عبد الله بن نجي، قال: قال علي: كانت لي ساعة من السحر أدخل فيها على رسول الله صلى الله عليه وسلم فإن كان قائما يصلي، سبح بي، فكان ذاك إذنه لي، وإن لم يكن يصلي أذن لي إسناده ضعيف، عبد الله بن نجي مختلف فيه، وثقه النسائي وابن حبان، وقال الحاكم بإثر حديث في "المستدرك" 1/171: من ثقات الكوفيين، ووافقه الذهبي، وقال البخاري وابن عدي: فيه نظر، وقال الدارقطني: ليس بالقوي في الحديث، وقال الشافعي: مجهول، ثم إنه لم يسمع من علي، بينه وبينه أبوه فيما قاله ابن معين، وباقي رجاله ثقات رجال الشيخين غير أبي سعيد مولى بني هاشم- واسمه عبد الرحمن بن عبد الله-، فمن رجال البخاري. أبو زرعة: هو ابن عمرو بن جرير بن عبد الله البجلي الكوفي، قيل: اسمه هرم، وقيل: عمرو، وقيل: عبد الله، وقيل: عبد الرحمن، وقيل: جرير وأخرجه البزار (882) عن أبي كامل، وابن خزيمة (904) من طريق معلى بن أسد، كلاهما عن عبد الواحد بن زياد، بهذا الإسناد. وسقط من رواية البزار الحارث العكلي، وفيه "تنحنح". وسيأتي برقم (608) و (845) و (1289) ، وأيضا برقم (647) من طريق عبد الله بن نجي، عن أبيه، عن علي. وانظر (598)

হাদিসের মানঃ যঈফ (Dai'f)
পুনঃনিরীক্ষণঃ
মুসনাদে আহমাদ
মুসনাদে আলী ইবনে আবি তালিব (রাঃ) [আলীর বর্ণিত হাদীস] (مسند علي بن أبي طالب)

পরিচ্ছেদঃ

৫৭১। আলী (রাঃ) বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম শেষ রাতে আমার কাছে এলেন। তখন আমি ও ফাতিমা ঘুমিয়ে ছিলাম। তিনি দরজায় দাঁড়িয়ে বললেনঃ তোমরা নামায পড়না? (অর্থাৎ তাহাজ্জুদ)। আমি তাঁর জবাবে বললামঃ ইয়া রাসূলাল্লাহ, আমাদের মন তো আল্লাহর হাতে। তিনি চাইলে আমাদেরকে জাগিয়ে দেবেন। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তৎক্ষণাত ফিরে গেলেন এবং আমার কথার কোন জবাব দিলেন না। আমি শুনতে পেলাম, তিনি ফিরে যাওয়ার সময় নিজের উরুতে হাত চাপড়ে বলছেনঃ وَكَانَ الْإِنْسَانُ أَكْثَرَ شَيْءٍ جَدَلًا “মানুষ সবার চেয়ে বেশি তার্কিক”। [সূরা আল কাহফঃ ৫৪)

(বুখারী-৭৩৪৭, মুসলিম-৭৭৫, ইবনু খুযাইমা-১১৩৯, ১১:৪০, মুসনাদে আহমাদ-৫৭৫, ৭০৫, ৯০০, ৯০১]

حَدَّثَنَا عَبْدُ اللهِ، حَدَّثَنَا إِسْمَاعِيلُ بْنُ عُبَيْدِ بْنِ أَبِي كَرِيمَةَ الْحَرَّانِيُّ، حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ سَلَمَةَ، عَنْ أَبِي عَبْدِ الرَّحِيمِ، عَنْ زَيْدِ بْنِ أَبِي أُنَيْسَةَ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، عَنْ عَلِيِّ بْنِ حُسَيْنٍ، عَنْ أَبِيهِ قَالَ: سَمِعْتُ عَلِيًّا يَقُولُ: أَتَانِي رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ وَأَنَا نَائِمٌ وَفَاطِمَةُ وَذَلِكَ مِنَ السَّحَرِ حَتَّى قَامَ عَلَى الْبَابِ، فَقَالَ: " أَلا تُصَلُّونَ؟ " فَقُلْتُ مُجِيبًا لَهُ: يَا رَسُولَ اللهِ، إِنَّمَا نُفُوسُنَا بِيَدِ اللهِ، فَإِذَا شَاءَ أَنْ يَبْعَثَنَا بَعَثَنَا، قَالَ: فَرَجَعَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ وَلَمْ يَرْجِعْ إِلَى الْكَلامِ، فَسَمِعْتُهُ حِينَ وَلَّى يَقُولُ: وَضَرَبَ بِيَدِهِ عَلَى فَخِذِهِ (وَكَانَ الْإِنْسَانُ أَكْثَرَ شَيْءٍ جَدَلًا) [الكهف: ٥٤]

إسناده صحيح، إسماعيل بن عبيد بن أبي كريمة الحراني ثقة روى له النسائي وابن ماجه، ومن فوقه ثقات من رجال الصحيح. أبو عبد الرحيم: هو خالد بن أبي يزيد الحراني، وهو خال محمد بن سلمة
وأخرجه البخاري (7347) من طريق إسحاق بن راشد، و (7465) من طريق محمد بن أبي عتيق، كلاهما عن الزهري، بهذا الإسناد. وسيأتي برقم (575) و (705) و (900) و (901)
وفي الحديث جوازُ الانتزاع من القرآن، وفيه منقبة لعلي حيث لم يكتم ما فيه أدنى غضاضة، فقدَّم مصلحة نشر العلم وتبليغه على كتمه، وفيه أنه ليس للإمام أن يشدد في النوافل حيث قَنعَ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ بقول علي: "أنفُسُنا بيد الله "، وأن الإنسان طُبع على الدفاع عن نفسه بالقول والفعل، وأنه ينبغي له أن يجاهد نفسه أن يقبل النصيحة ولو كانت في غير واجبٍ انظر "الفتح" 3/10-11 و13/314-315

حدثنا عبد الله، حدثنا إسماعيل بن عبيد بن أبي كريمة الحراني، حدثنا محمد بن سلمة، عن أبي عبد الرحيم، عن زيد بن أبي أنيسة، عن الزهري، عن علي بن حسين، عن أبيه قال: سمعت عليا يقول: أتاني رسول الله صلى الله عليه وسلم وأنا نائم وفاطمة وذلك من السحر حتى قام على الباب، فقال: " ألا تصلون؟ " فقلت مجيبا له: يا رسول الله، إنما نفوسنا بيد الله، فإذا شاء أن يبعثنا بعثنا، قال: فرجع رسول الله صلى الله عليه وسلم ولم يرجع إلى الكلام، فسمعته حين ولى يقول: وضرب بيده على فخذه (وكان الإنسان أكثر شيء جدلا) [الكهف: ٥٤] إسناده صحيح، إسماعيل بن عبيد بن أبي كريمة الحراني ثقة روى له النسائي وابن ماجه، ومن فوقه ثقات من رجال الصحيح. أبو عبد الرحيم: هو خالد بن أبي يزيد الحراني، وهو خال محمد بن سلمة وأخرجه البخاري (7347) من طريق إسحاق بن راشد، و (7465) من طريق محمد بن أبي عتيق، كلاهما عن الزهري، بهذا الإسناد. وسيأتي برقم (575) و (705) و (900) و (901) وفي الحديث جواز الانتزاع من القرآن، وفيه منقبة لعلي حيث لم يكتم ما فيه أدنى غضاضة، فقدم مصلحة نشر العلم وتبليغه على كتمه، وفيه أنه ليس للإمام أن يشدد في النوافل حيث قنع صلى الله عليه وسلم بقول علي: "أنفسنا بيد الله "، وأن الإنسان طبع على الدفاع عن نفسه بالقول والفعل، وأنه ينبغي له أن يجاهد نفسه أن يقبل النصيحة ولو كانت في غير واجب انظر "الفتح" 3/10-11 و13/314-315

হাদিসের মানঃ সহিহ (Sahih)
পুনঃনিরীক্ষণঃ
মুসনাদে আহমাদ
মুসনাদে আলী ইবনে আবি তালিব (রাঃ) [আলীর বর্ণিত হাদীস] (مسند علي بن أبي طالب)

পরিচ্ছেদঃ

৫৭২। আলী (রাঃ) বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ও তাঁর পরিবার একই পাত্র থেকে পানি নিয়ে গোসল করতেন।

[ইবনু মাজাহ-৩৭৫]

حَدَّثَنَا أَبُو سَعِيدٍ، حَدَّثَنَا إِسْرَائِيلُ، حَدَّثَنَا أَبُو إِسْحَاقَ، عَنِ الْحَارِثِ عَنْ عَلِيٍّ، قَالَ: " كَانَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ وَأَهْلُهُ يَغْتَسِلُونَ مِنْ إِنَاءٍ وَاحِدٍ

حسن لغيره، وهذا إسناد ضعيف لضعف الحارث
وأخرجه ابن أبي شيبة 1/36، وابن ماجه (375) ، والبزار (846) من طريق عبيد الله بن موسى، عن إسرائيل، بهذا الإسناد. وقد تحرف "عبيد الله" في المطبوع من ابن أبي شيبة إلى: عبد الله
وفي الباب عن عائشة عند البخاري (250) ، ومسلم (319) بلفظ: كنت أغتسل أنا والنبي صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ من إناء واحد. وانظر تمام تخريجه في "صحيح ابن حبان" (1108) . وعن أنس عند البخاري (264) بلفظ: كان النبي صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ والمرأةُ من نسائه يغتسلان من إناء واحد

حدثنا أبو سعيد، حدثنا إسرائيل، حدثنا أبو إسحاق، عن الحارث عن علي، قال: " كان رسول الله صلى الله عليه وسلم وأهله يغتسلون من إناء واحد حسن لغيره، وهذا إسناد ضعيف لضعف الحارث وأخرجه ابن أبي شيبة 1/36، وابن ماجه (375) ، والبزار (846) من طريق عبيد الله بن موسى، عن إسرائيل، بهذا الإسناد. وقد تحرف "عبيد الله" في المطبوع من ابن أبي شيبة إلى: عبد الله وفي الباب عن عائشة عند البخاري (250) ، ومسلم (319) بلفظ: كنت أغتسل أنا والنبي صلى الله عليه وسلم من إناء واحد. وانظر تمام تخريجه في "صحيح ابن حبان" (1108) . وعن أنس عند البخاري (264) بلفظ: كان النبي صلى الله عليه وسلم والمرأة من نسائه يغتسلان من إناء واحد

হাদিসের মানঃ হাসান (Hasan)
পুনঃনিরীক্ষণঃ
মুসনাদে আহমাদ
মুসনাদে আলী ইবনে আবি তালিব (রাঃ) [আলীর বর্ণিত হাদীস] (مسند علي بن أبي طالب)

পরিচ্ছেদঃ

৫৭৩। আলী (রাঃ) বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়সাল্লাম আমাকে ইয়ামানে প্রেরণ করলেন। আমরা এমন একটা গোষ্ঠীর কাছে যাত্রা বিরতি করলাম, যারা সিংহের জন্য একটা গর্ত তৈরী করেছিল। এলাকার লোকেরা গর্তের পাশে ধাক্কাধাক্কি করতে করতে একজন গর্তে পড়ে গেল। সে ওপরে থাকা অন্য একজনের সাথে যুক্ত ছিল। (সেও পড়ে গেল) সে আর একজনের সাথে যুক্ত ছিল। এভাবে গর্তের ভেতরে চারজন একত্রিত হলো। ভেতরে থাকা সিংহটি তাদেরকে আহত করলো। তৎক্ষণাত এক ব্যক্তি বর্শা নিয়ে সিংহের মুখোমুখী হলো এবং তাকে হত্যা করলো, সিংহের আঘাতে ৪ ব্যক্তিই মারা গেল। প্রথম ব্যক্তির উত্তরাধিকারীরা শেষ ব্যক্তির উত্তরাধিকারীদের কাছে গেল এবং উভয় পক্ষ অস্ত্ৰ সজ্জিত হয়ে যুদ্ধ করতে উদ্যত হলো।

তখন আলী (রাঃ) উত্তেজনা প্রশমিত করতে তাদের কাছে গেলেন। তিনি বললেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম জীবিত থাকতেই তোমরা যুদ্ধ করতে চাও? আমি তোমাদের বিবাদ মিটিয়ে দিচ্ছি। আমার ফায়সালা যদি তোমাদের মনঃপূত হয় তবে তো ভালো কথা। নচেত তোমরা একে অপর থেকে নিরন্ত্র থাকবে এবং রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে যাবে। তিনি ফায়সালা করে দেবেন। তারপরও যে ব্যক্তি বাড়াবাড়ি করবে, সে কিছুই পাবে না।

যে সকল গোত্র এই কুয়োটা খুঁড়েছে, তাদের কাছ থেকে দিয়াতের এক চতুর্থাংশ, এক তৃতীয়াংশ, অর্ধাংশ এবং পূর্ণ দিয়াত আদায় কর। তারপর প্রথম জন পাবে এক চতুর্থাংশ। কেননা তার ওপরের জন মারা গেছে। আর দ্বিতীয়জন পাবে এক তৃতীয়াংশ এবং তৃতীয়জন অর্ধেক। এ ফায়সালা তারা মানতে রাজী হলো না। অগত্যা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে গেল। তিনি তখন মাকামে ইবরাহীমে ছিলেন। তারা তার কাছে পুরো ঘটনা খুলে বললো। তিনি ‘আমি তোমাদের বিবাদের মীমাংসা করে দিচ্ছি’ এই বলে ঠেস দিয়ে বসলেন। আগন্তুকদের একজন বললোঃ আলী আমাদের বিবাদের নিম্পত্তি করেছেন। অতপর সে আলীর বিচারের বিবরণ দিল। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আলীর বিচারকে যথার্থ বলে সম্মতি দিলেন।

[হাদীস নং-৫৪৭, ১০৬৩, ১৩১০]

حَدَّثَنَا أَبُو سَعِيدٍ، حَدَّثَنَا إِسْرَائِيلُ، حَدَّثَنَا سِمَاكٌ، عَنْ حَنَشٍ، عَنْ عَلِيٍّ، قَالَ: بَعَثَنِي رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ إِلَى الْيَمَنِ، فَانْتَهَيْنَا إِلَى قَوْمٍ قَدْ بَنَوْا زُبْيَةً لِلْأَسَدِ، فَبَيْنَا هُمْ كَذَلِكَ يَتَدَافَعُونَ إِذْ سَقَطَ رَجُلٌ، فَتَعَلَّقَ بِآخَرَ، ثُمَّ تَعَلَّقَ رَجُلٌ بِآخَرَ، حَتَّى صَارُوا فِيهَا أَرْبَعَةً، فَجَرَحَهُمِ الْأَسَدُ، فَانْتَدَبَ لَهُ رَجُلٌ بِحَرْبَةٍ فَقَتَلَهُ، وَمَاتُوا مِنْ جِرَاحَتِهِمْ كُلُّهُمْ، فَقَامَ أَوْلِيَاءُ الْأَوَّلِ إِلَى أَوْلِيَاءِ الْآخِرِ، فَأَخْرَجُوا السِّلاحَ لِيَقْتَتِلُوا، فَأَتَاهُمْ عَلِيٌّ رَضِيَ اللهُ عَنْهُ عَلَى تَفِيئَةِ ذَلِكَ، فَقَالَ: تُرِيدُونَ أَنْ تَقَاتَلُوا وَرَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ حَيٌّ؟ إِنِّي أَقْضِي بَيْنَكُمْ قَضَاءً إِنْ رَضِيتُمْ فَهُوَ الْقَضَاءُ، وَإِلا حَجَزَ بَعْضُكُمْ عَنْ بَعْضٍ حَتَّى تَأْتُوا النَّبِيَّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فَيَكُونَ هُوَ الَّذِي يَقْضِي بَيْنَكُمْ، فَمَنْ عَدَا بَعْدَ ذَلِكَ فَلا حَقَّ لَهُ، اجْمَعُوا مِنْ قَبَائِلِ الَّذِينَ حَضَرُوا الْبِئْرَ رُبُعَ الدِّيَةِ، وَثُلُثَ الدِّيَةِ وَنِصْفَ الدِّيَةِ وَالدِّيَةَ كَامِلَةً، فَلِلْأَوَّلِ الرُّبُعُ، لِأَنَّهُ هَلَكَ مَنْ فَوْقَهُ، وَلِلثَّانِي ثُلُثُ الدِّيَةِ، وَلِلثَّالِثِ نِصْفُ الدِّيَةِ فَأَبَوْا، أَنْ يَرْضَوْا، فَأَتَوْا النَّبِيَّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ وَهُوَ عِنْدَ مَقَامِ إِبْرَاهِيمَ، فَقَصُّوا عَلَيْهِ الْقِصَّةَ، فَقَالَ: " أَنَا أَقْضِي بَيْنَكُمْ " واحْتَبَى، فَقَالَ: رَجُلٌ مِنَ الْقَوْمِ: إِنَّ عَلِيًّا قَضَى فِينَا، فَقَصُّوا عَلَيْهِ الْقِصَّةَ، فَأَجَازَهُ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ

إسناده ضعيف، حنش- وهو ابن المعتمر، ويقال: ابن ربيعة الكناني- قال البخاري: يتكلمون في حديثه، وقال النسائي: ليس بالقوي، وقال أبو حاتم: ليس أراهم يحتجون بحديثه، وقال ابنُ حِبان: لا يُحتج بحديثه، وقال الحاكم: ليس بالمتين عندهم، وقال أبو داود: ثقة ولم يتابع، وقال الحافظ في "التقريب": صدوق له أوهام
وأخرجه البيهقي 8/111 من طريق مصعب بن المقدام، عن إسرائيل، بهذا الإسناد. وأخرجه الطيالسي (114) ، وابن أبي شيبة 9/400، والبزار (732) ، ووكيع في أخبار القضاة" 1/95-97 و97، والبيهقي 8/111 مِن طُرقٍ عن سماك، به، قال البزار: وهذا الحديث لا نعلمه يروى إلا عن علي، عن النبي صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ ولا نعلم له طريقاً عن علي إلا عن هذا الطريق. وسيأتي (574) و (1063) و (1310)
والزبية: حفيرة تُحْفَرُ وتغَطَّى ليقع فيها الأسد فَيُصَادُ هو أو غيره، سميت بذلك، لأنهم كانوا يحفرونها في موضع عال، والزُّبية في الأصل: الرابية التي لا يعلوها ماء
وقوله: "على تَفِيئة ذلك "، أي: على أثره
قوله: "هلك مَن فوقَه "، ضبط في (ظ 11) و (س) بفتح الميم والقاف، وضبط في (ب) بكسرهما، قال السندي: أي: هَلَك بثِقَلِ ثلاثة من فوقه مع جَرْح الأسد، وقد تسبب لثقلهم عليه حيث جَرَّهم وتعلق بهم، إذ الثاني والثالث ما تعلق بآخَرَ إلا بسبب تعلُّقِ الأول به، فصار هو السبب لسقوط الثلاثة عليه وثقلهم، فسقط من ديته بقدرما تسبب له، وبالجُملة فقد مات باجتماع أربعة أسباب: الثلاثة منها ثقلُ ثلاثة من فوقه، والرابع: جَرْحُ الأسد، وقد تسبب لثلاثة، فسقط من الدّية ثلاثة أرباع، وبقي ربعُ الدية، وهو على مَن تسبب لوقوعه في البئر الذي أدّى إلى جرح الأسد، وهم أهلُ الزِّحام، ثم إن تعلقه بهم، وإن كان فعلاً له، إلا أنه تسببَ عن سقوطه في البئر الذي وُجِدَ لأجل الزحام، وقد ترتب على هذا التعلق موتُه وموتهم، فمن حيث إنه أدى إلى موته يُعتبر فعلاً له، فيسقط من ديته بقدر ذلك، ومن حيث إنه أدى إلى موتهم يعتبر أنه أثر لزحامهم، فتجبُ ديتهم على أهل الزحام، وعلى هذا القياس
قوله: "وللثاني ثلثُ الدية"، لأنه مات بثلاثة أسباب: ثقل اثنين فوقه، وهو سبب له، وجرح الأسد المترتب على سقوطه، وأهلُ الزحام سبب لذلك كما قررنا، وهكذا الباقي، وبالجملة فهذا مبنيٌّ على أن الدية تُوَزَّعُ على أسباب الموت، ثم إنْ تَسبَّبَ هو لشيء من الأسباب يسقط من الدية بقدره، ثم إنْ أدّى ذلك السبب إلى موته وموت غيره، ففي حَقه تسقط الدية بقدره، وفي حق غيره يُنْظَرُ منشأ هذا السبب، وكل ذلك أمر معقول، سواء أخذ به أحد أم لا، فلا إشكال في الحديث، والله تعالى أعلم

حدثنا أبو سعيد، حدثنا إسرائيل، حدثنا سماك، عن حنش، عن علي، قال: بعثني رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى اليمن، فانتهينا إلى قوم قد بنوا زبية للأسد، فبينا هم كذلك يتدافعون إذ سقط رجل، فتعلق بآخر، ثم تعلق رجل بآخر، حتى صاروا فيها أربعة، فجرحهم الأسد، فانتدب له رجل بحربة فقتله، وماتوا من جراحتهم كلهم، فقام أولياء الأول إلى أولياء الآخر، فأخرجوا السلاح ليقتتلوا، فأتاهم علي رضي الله عنه على تفيئة ذلك، فقال: تريدون أن تقاتلوا ورسول الله صلى الله عليه وسلم حي؟ إني أقضي بينكم قضاء إن رضيتم فهو القضاء، وإلا حجز بعضكم عن بعض حتى تأتوا النبي صلى الله عليه وسلم فيكون هو الذي يقضي بينكم، فمن عدا بعد ذلك فلا حق له، اجمعوا من قبائل الذين حضروا البئر ربع الدية، وثلث الدية ونصف الدية والدية كاملة، فللأول الربع، لأنه هلك من فوقه، وللثاني ثلث الدية، وللثالث نصف الدية فأبوا، أن يرضوا، فأتوا النبي صلى الله عليه وسلم وهو عند مقام إبراهيم، فقصوا عليه القصة، فقال: " أنا أقضي بينكم " واحتبى، فقال: رجل من القوم: إن عليا قضى فينا، فقصوا عليه القصة، فأجازه رسول الله صلى الله عليه وسلم إسناده ضعيف، حنش- وهو ابن المعتمر، ويقال: ابن ربيعة الكناني- قال البخاري: يتكلمون في حديثه، وقال النسائي: ليس بالقوي، وقال أبو حاتم: ليس أراهم يحتجون بحديثه، وقال ابن حبان: لا يحتج بحديثه، وقال الحاكم: ليس بالمتين عندهم، وقال أبو داود: ثقة ولم يتابع، وقال الحافظ في "التقريب": صدوق له أوهام وأخرجه البيهقي 8/111 من طريق مصعب بن المقدام، عن إسرائيل، بهذا الإسناد. وأخرجه الطيالسي (114) ، وابن أبي شيبة 9/400، والبزار (732) ، ووكيع في أخبار القضاة" 1/95-97 و97، والبيهقي 8/111 من طرق عن سماك، به، قال البزار: وهذا الحديث لا نعلمه يروى إلا عن علي، عن النبي صلى الله عليه وسلم ولا نعلم له طريقا عن علي إلا عن هذا الطريق. وسيأتي (574) و (1063) و (1310) والزبية: حفيرة تحفر وتغطى ليقع فيها الأسد فيصاد هو أو غيره، سميت بذلك، لأنهم كانوا يحفرونها في موضع عال، والزبية في الأصل: الرابية التي لا يعلوها ماء وقوله: "على تفيئة ذلك "، أي: على أثره قوله: "هلك من فوقه "، ضبط في (ظ 11) و (س) بفتح الميم والقاف، وضبط في (ب) بكسرهما، قال السندي: أي: هلك بثقل ثلاثة من فوقه مع جرح الأسد، وقد تسبب لثقلهم عليه حيث جرهم وتعلق بهم، إذ الثاني والثالث ما تعلق بآخر إلا بسبب تعلق الأول به، فصار هو السبب لسقوط الثلاثة عليه وثقلهم، فسقط من ديته بقدرما تسبب له، وبالجملة فقد مات باجتماع أربعة أسباب: الثلاثة منها ثقل ثلاثة من فوقه، والرابع: جرح الأسد، وقد تسبب لثلاثة، فسقط من الدية ثلاثة أرباع، وبقي ربع الدية، وهو على من تسبب لوقوعه في البئر الذي أدى إلى جرح الأسد، وهم أهل الزحام، ثم إن تعلقه بهم، وإن كان فعلا له، إلا أنه تسبب عن سقوطه في البئر الذي وجد لأجل الزحام، وقد ترتب على هذا التعلق موته وموتهم، فمن حيث إنه أدى إلى موته يعتبر فعلا له، فيسقط من ديته بقدر ذلك، ومن حيث إنه أدى إلى موتهم يعتبر أنه أثر لزحامهم، فتجب ديتهم على أهل الزحام، وعلى هذا القياس قوله: "وللثاني ثلث الدية"، لأنه مات بثلاثة أسباب: ثقل اثنين فوقه، وهو سبب له، وجرح الأسد المترتب على سقوطه، وأهل الزحام سبب لذلك كما قررنا، وهكذا الباقي، وبالجملة فهذا مبني على أن الدية توزع على أسباب الموت، ثم إن تسبب هو لشيء من الأسباب يسقط من الدية بقدره، ثم إن أدى ذلك السبب إلى موته وموت غيره، ففي حقه تسقط الدية بقدره، وفي حق غيره ينظر منشأ هذا السبب، وكل ذلك أمر معقول، سواء أخذ به أحد أم لا، فلا إشكال في الحديث، والله تعالى أعلم

হাদিসের মানঃ যঈফ (Dai'f)
পুনঃনিরীক্ষণঃ
মুসনাদে আহমাদ
মুসনাদে আলী ইবনে আবি তালিব (রাঃ) [আলীর বর্ণিত হাদীস] (مسند علي بن أبي طالب)

পরিচ্ছেদঃ

৫৭৪। হাদীস নং ৫৭৩ দ্রষ্টব্য। (পূর্বের হাদীস)

সংযোজনঃ আলী (রাঃ) বললেনঃ চতুৰ্থজন পূর্ণ দিয়াত পাবে।

حَدَّثَنَا بَهْزٌ، حَدَّثَنَا حَمَّادٌ، أَخْبَرَنَا سِمَاكٌ، عَنْ حَنَشٍ، أَنَّ عَلِيًّا، قَالَ: وَلِلرَّابِعِ الدِّيَةُ كَامِلَةً

إسناده ضعيف كسابقه. بهز: هو ابن أسد العمِّي، وحماد: هو ابن سلمة
وأخرجه الطيالسي (114) ، ومن طريقه البيهقي 8/111 عن حماد بن سلمة، بهذا الإسناد. وانظر ما قبله

حدثنا بهز، حدثنا حماد، أخبرنا سماك، عن حنش، أن عليا، قال: وللرابع الدية كاملة إسناده ضعيف كسابقه. بهز: هو ابن أسد العمي، وحماد: هو ابن سلمة وأخرجه الطيالسي (114) ، ومن طريقه البيهقي 8/111 عن حماد بن سلمة، بهذا الإسناد. وانظر ما قبله

হাদিসের মানঃ যঈফ (Dai'f)
পুনঃনিরীক্ষণঃ
মুসনাদে আহমাদ
মুসনাদে আলী ইবনে আবি তালিব (রাঃ) [আলীর বর্ণিত হাদীস] (مسند علي بن أبي طالب)

পরিচ্ছেদঃ

৫৭৫। হাদীস নং ৫৭১ দ্রষ্টব্য।


৫৭১। আলী (রাঃ) বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম শেষ রাতে আমার কাছে এলেন। তখন আমি ও ফাতিমা ঘুমিয়ে ছিলাম। তিনি দরজায় দাঁড়িয়ে বললেনঃ তোমরা নামায পড়না? (অর্থাৎ তাহাজ্জুদ)। আমি তাঁর জবাবে বললামঃ ইয়া রাসূলাল্লাহ, আমাদের মন তো আল্লাহর হাতে। তিনি চাইলে আমাদেরকে জাগিয়ে দেবেন। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তৎক্ষণাত ফিরে গেলেন এবং আমার কথার কোন জবাব দিলেন না। আমি শুনতে পেলাম, তিনি ফিরে যাওয়ার সময় নিজের উরুতে হাত চাপড়ে বলছেনঃ وَكَانَ الْإِنْسَانُ أَكْثَرَ شَيْءٍ جَدَلًا “মানুষ সবার চেয়ে বেশি তার্কিক”। [সূরা আল কাহফঃ ৫৪)


হাদিসের মানঃ সহিহ (Sahih)
পুনঃনিরীক্ষণঃ
মুসনাদে আহমাদ
মুসনাদে আলী ইবনে আবি তালিব (রাঃ) [আলীর বর্ণিত হাদীস] (مسند علي بن أبي طالب)

পরিচ্ছেদঃ

৫৭৬। আলী (রাঃ) থেকে বর্ণিত। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম হাসান ও হুসাইনের হাত ধরে বললেনঃ যে ব্যক্তি আমাকে ভালোবাসে এবং এই দু’জনকে, এদের পিতা ও মাতাকে ভালোবাসে, সে কিয়ামতের দিন আমার সাথে আমার মর্যাদায় অবস্থান করবে। [তিরমিযী-৩৭৩৩]

حَدَّثَنَا عَبْدُ اللهِ، حَدَّثَنِي نَصْرُ بْنُ عَلِيٍّ الْأَزْدِيُّ، أَخْبَرَنِي عَلِيُّ بْنُ جَعْفَرِ بْنِ مُحَمَّدِ بْنِ عَلِيِّ بْنِ الْحُسَيْنِ بْنِ عَلِيٍّ، حَدَّثَنِي أَخِي مُوسَى بْنُ جَعْفَرٍ، عَنْ أَبِيهِ جَعْفَرِ بْنِ مُحَمَّدٍ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ عَلِيِّ بْنِ حُسَيْنٍ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ جَدِّهِ، أَنَّ رَسُولَ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ أَخَذَ بِيَدِ حَسَنٍ وَحُسَيْنٍ فَقَالَ: مَنْ أَحَبَّنِي وَأَحَبَّ هَذَيْنِ، وَأَبَاهُمَا وَأُمَّهُمَا كَانَ مَعِي فِي دَرَجَتِي يَوْمَ الْقِيَامَةِ

ضعيف، علي بن جعفر بن محمد روى عنه جمع، ولكنه لا يعْرَف بجرحٍ ولا تعديل، وباقي رجاله ثقات، قال الإمام الذهبي في "الميزان" 3/117 في ترجمة علي بن جعفر: ما هو مِن شرط الترمذي ولا حسنه ... ثم ذكر هذا الحديث، وأورده في "السير" 12/135 في ترجمة نصر بن علي الأزدي شيخ عبد الله بن أحمد فيه، وقال: هذا حديث منكر جداً ... وما في رواة الخبر إلا ثقة ما خلا علي بن جعفر، فلعله لم يَضبطْ لفظ الحديث، وما كان النبي-صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ من حُبِّه وبثِّ فضيلة الحسنين ليجعل كلَّ من أحبَهما في درجته في الجنة، فلعله قال: فهو معي في الجنة، وقد تواتر قوله عليه السلام: "المرء مع مَنْ أحب"، ونصر بن علي فمن أئمة السنة الأثبات
وأخرجه الترمذي (3733) عن نصر بن علي، بهذا الإسناد. قال الترمذي: حسن غريب. كذا وقع في المطبوعة: حسن ... وهي كذلك في "تحفة الأحوذي، وكلمة حسن لم ترد في النسخ القديمة المسموعة التي اعتمدها الحافظ المزي في كتابه "تحفة الأشراف"، ولعلها وقعت في بعض النسخ دون بعض، والله أعلم

حدثنا عبد الله، حدثني نصر بن علي الأزدي، أخبرني علي بن جعفر بن محمد بن علي بن الحسين بن علي، حدثني أخي موسى بن جعفر، عن أبيه جعفر بن محمد، عن أبيه، عن علي بن حسين، عن أبيه، عن جده، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم أخذ بيد حسن وحسين فقال: من أحبني وأحب هذين، وأباهما وأمهما كان معي في درجتي يوم القيامة ضعيف، علي بن جعفر بن محمد روى عنه جمع، ولكنه لا يعرف بجرح ولا تعديل، وباقي رجاله ثقات، قال الإمام الذهبي في "الميزان" 3/117 في ترجمة علي بن جعفر: ما هو من شرط الترمذي ولا حسنه ... ثم ذكر هذا الحديث، وأورده في "السير" 12/135 في ترجمة نصر بن علي الأزدي شيخ عبد الله بن أحمد فيه، وقال: هذا حديث منكر جدا ... وما في رواة الخبر إلا ثقة ما خلا علي بن جعفر، فلعله لم يضبط لفظ الحديث، وما كان النبي-صلى الله عليه وسلم من حبه وبث فضيلة الحسنين ليجعل كل من أحبهما في درجته في الجنة، فلعله قال: فهو معي في الجنة، وقد تواتر قوله عليه السلام: "المرء مع من أحب"، ونصر بن علي فمن أئمة السنة الأثبات وأخرجه الترمذي (3733) عن نصر بن علي، بهذا الإسناد. قال الترمذي: حسن غريب. كذا وقع في المطبوعة: حسن ... وهي كذلك في "تحفة الأحوذي، وكلمة حسن لم ترد في النسخ القديمة المسموعة التي اعتمدها الحافظ المزي في كتابه "تحفة الأشراف"، ولعلها وقعت في بعض النسخ دون بعض، والله أعلم

হাদিসের মানঃ যঈফ (Dai'f)
পুনঃনিরীক্ষণঃ
মুসনাদে আহমাদ
মুসনাদে আলী ইবনে আবি তালিব (রাঃ) [আলীর বর্ণিত হাদীস] (مسند علي بن أبي طالب)

পরিচ্ছেদঃ

৫৭৭। আলী (রাঃ) বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেনঃ কোন মহিলাকে তার ফুফু, বা খালার জীবিতাবস্থায় তাদের স্বামীর সাথে বিয়ে দেয়া চলবে না।

حَدَّثَنَا حَسَنُ بْنُ مُوسَى، حَدَّثَنَا ابْنُ لَهِيعَةَ، حَدَّثَنَا عَبْدُ اللهِ بْنُ هُبَيْرَةَ السَّبَئِيُّ، عَنْ عَبْدِ اللهِ بْنِ زُرَيْرٍ الْغَافِقِىِّ، عَنْ عَلِيٍّ، قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: " لَا تُنْكَحُ الْمَرْأَةُ عَلَى عَمَّتِهَا، وَلا عَلَى خَالَتِهَا

حديث حسن لغيره، ابن لهيعة- وإن كان سيئ الحفظ- حديثه حسن في الشواهد، وهذا منها، وباقي رجال الإسناد ثقات
وأخرجه البزار (888) ، وأبو يعلى (360) من طريق حسن بن موسى، بهذا الإسناد
وأخرجه محمد بن نصر في "السنة" (283) من طريق أبي الأسود، عن ابن لهيعة
وله شاهد من حديث أبي هريرة عند البخاري (5109) ، ومسلم (1408)

حدثنا حسن بن موسى، حدثنا ابن لهيعة، حدثنا عبد الله بن هبيرة السبئي، عن عبد الله بن زرير الغافقى، عن علي، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: " لا تنكح المرأة على عمتها، ولا على خالتها حديث حسن لغيره، ابن لهيعة- وإن كان سيئ الحفظ- حديثه حسن في الشواهد، وهذا منها، وباقي رجال الإسناد ثقات وأخرجه البزار (888) ، وأبو يعلى (360) من طريق حسن بن موسى، بهذا الإسناد وأخرجه محمد بن نصر في "السنة" (283) من طريق أبي الأسود، عن ابن لهيعة وله شاهد من حديث أبي هريرة عند البخاري (5109) ، ومسلم (1408)

হাদিসের মানঃ হাসান (Hasan)
পুনঃনিরীক্ষণঃ
মুসনাদে আহমাদ
মুসনাদে আলী ইবনে আবি তালিব (রাঃ) [আলীর বর্ণিত হাদীস] (مسند علي بن أبي طالب)

পরিচ্ছেদঃ

৫৭৮। আবদুল্লাহ ইবনে যুবাইর বলেছেন, আমি আলী ইবনে আবী তালিবের নিকট গেলাম। (হাসান বলেছেনঃ ঈদুল আযহার দিনে।) তিনি একটা খরগোশ (রান্না করা) আমাদের সামনে পাঠালেন। আমি বললামঃ আল্লাহ আপনার কল্যাণ করুন, আপনি যদি একটা হাঁস অর্থাৎ রাজ হাঁস পাঠাতেন, ভালো হতো। কেননা এতে আল্লাহ অনেক কল্যাণ রেখেছেন। আলী (রাঃ) বললেনঃ হে ইবনে যুবাইর, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি, আল্লাহর সম্পদ থেকে খালীফার জন্য দুটো থালাই হালাল, এক থালায় সে নিজে ও তার পরিবার খাবে, অপর থালা সে জনসাধারণের সামনে রাখবে।

حَدَّثَنَا حَسَنٌ، وَأَبُو سَعِيدٍ، مَوْلَى بَنِي هَاشِمٍ، قَالا: حَدَّثَنَا ابْنُ لَهِيعَةَ، حَدَّثَنَا عَبْدُ اللهِ بْنُ هُبَيْرَةَ، عَنْ عَبْدِ اللهِ بْنِ زُرَيْرٍ، أَنَّهُ قَالَ: دَخَلْتُ عَلَى عَلِيِّ بْنِ أَبِي طَالِبٍ، - قَالَ حَسَنٌ: يَوْمَ الْأَضْحَى - فَقَرَّبَ إِلَيْنَا خَزِيرَةً فَقُلْتُ: أَصْلَحَكَ اللهُ، لَوْ قَرَّبْتَ إِلَيْنَا مِنْ هَذَا الْبَطِّ - يَعْنِي الْوَزَّ - فَإِنَّ اللهَ عَزَّ وَجَلَّ قَدْ أَكْثَرَ الْخَيْرَ. فَقَالَ: يَا ابْنَ زُرَيْرٍ، إِنِّي سَمِعْتُ رَسُولَ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَقُولُ: " لَا يَحِلُّ لِلْخَلِيفَةِ مِنْ مَالِ اللهِ إِلا قَصْعَتَانِ: قَصْعَةٌ يَأْكُلُهَا هُوَ وَأَهْلُهُ، وَقَصْعَةٌ يَضَعُهَا بَيْنَ يَدَيِ النَّاسِ

إسناده ضعيف لضعف ابن لهيعة
والخزيرة: لحم يُقطع صِغاراً ويُصب عليه ماء كثير، فإذا نضج ذُرَّ عليه الدقيق

حدثنا حسن، وأبو سعيد، مولى بني هاشم، قالا: حدثنا ابن لهيعة، حدثنا عبد الله بن هبيرة، عن عبد الله بن زرير، أنه قال: دخلت على علي بن أبي طالب، - قال حسن: يوم الأضحى - فقرب إلينا خزيرة فقلت: أصلحك الله، لو قربت إلينا من هذا البط - يعني الوز - فإن الله عز وجل قد أكثر الخير. فقال: يا ابن زرير، إني سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: " لا يحل للخليفة من مال الله إلا قصعتان: قصعة يأكلها هو وأهله، وقصعة يضعها بين يدي الناس إسناده ضعيف لضعف ابن لهيعة والخزيرة: لحم يقطع صغارا ويصب عليه ماء كثير، فإذا نضج ذر عليه الدقيق

হাদিসের মানঃ যঈফ (Dai'f)
পুনঃনিরীক্ষণঃ
মুসনাদে আহমাদ
মুসনাদে আলী ইবনে আবি তালিব (রাঃ) [আলীর বর্ণিত হাদীস] (مسند علي بن أبي طالب)

পরিচ্ছেদঃ

৫৭৯। আলী (রাঃ) বলেছেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যেদিন আমার চোখে থুথু দিয়েছেন, তার পর থেকে আর কখনো আমার চোখ ওঠেনি।

حَدَّثَنَا مُعْتَمِرُ بْنُ سُلَيْمَانَ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ مُغِيرَةَ، عَنْ أُمِّ مُوسَى، عَنْ عَلِيٍّ، قَالَ: " مَا رَمِدْتُ مُنْذُ تَفَلَ النَّبِيُّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فِي عَيْنِي

إسناده حسن، أم موسى- وهي سُرية علي بن أبي طالب- قيل: اسمها فاختة، وقيل: حبيبة، لم يرو عنها غير مغيرة بن مقسم الضبي، قال الدارقطني: حديثُها مستقيم يخرح حديثها اعتباراً، وقال العجلي: كوفية تابعية ثقة، وباقي رجال الإسناد ثقات رجال الشيخين
وأخرجه الطيالسي (189) عن أبي عَوانة، وأبو يعلى (593) ، والطبري في "تهذيب الآثار" ص 168 من طريق جرير، كلاهما عن مغيرة، بهذا الإسناد
ويشهد له حديث سهل بن سعد عند البخاري (4210) ، وانظر شرحه للحافظ ابن حجر

حدثنا معتمر بن سليمان، عن أبيه، عن مغيرة، عن أم موسى، عن علي، قال: " ما رمدت منذ تفل النبي صلى الله عليه وسلم في عيني إسناده حسن، أم موسى- وهي سرية علي بن أبي طالب- قيل: اسمها فاختة، وقيل: حبيبة، لم يرو عنها غير مغيرة بن مقسم الضبي، قال الدارقطني: حديثها مستقيم يخرح حديثها اعتبارا، وقال العجلي: كوفية تابعية ثقة، وباقي رجال الإسناد ثقات رجال الشيخين وأخرجه الطيالسي (189) عن أبي عوانة، وأبو يعلى (593) ، والطبري في "تهذيب الآثار" ص 168 من طريق جرير، كلاهما عن مغيرة، بهذا الإسناد ويشهد له حديث سهل بن سعد عند البخاري (4210) ، وانظر شرحه للحافظ ابن حجر

হাদিসের মানঃ হাসান (Hasan)
পুনঃনিরীক্ষণঃ
মুসনাদে আহমাদ
মুসনাদে আলী ইবনে আবি তালিব (রাঃ) [আলীর বর্ণিত হাদীস] (مسند علي بن أبي طالب)

পরিচ্ছেদঃ

৫৮০। আলী (রাঃ) বলেছেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম রাতের প্রথমাংশে, মধ্যরাতে ও শেষ রাতে বিতর পড়তেন। তারপর শেষ রাতের বিতরই তাঁর জন্য স্থায়ী হলো।

[ইবনু মাজাহ-১৮৬৬, মুসনাদে আহমাদ-৬৫৩,৮২৫, ১১৫২, ১২১৫, ১২১৮, ১২৬০]

حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ فُضَيْلٍ، حَدَّثَنَا مُطَرِّفٌ، عَنْ أَبِي إِسْحَاقَ، عَنْ عَاصِمٍ، عَنْ عَلِيٍّ، قَالَ: " كَانَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يُوتِرُ فِي أَوَّلِ اللَّيْلِ، وَفِي وَسَطِهِ، وَفِي آخِرِهِ، ثُمَّ ثَبَتَ لَهُ الْوَتْرُ فِي آخِرِهِ

إسناده قوي، عاصم: هو ابن ضمرة، وثقه العجلي وعلي بن المديني وابن سعد والترمذي، وقال النسائي: ليس به بأس، وقال البزار: صالح الحديث، وقال الحافظ في "التقريب": صدوق، وباقي رجاله ثقات رجال الشيخين. مطرف: هو ابن طريف الكوفي، وقد تابعه شعبة وهو ممن روى عن أبي إسحاق السبيعي قبل تغيُّره
وأخرجه البزار (681) من طريق محمد بن فضيل، بهذا الإسناد
وأخرجه الطحاوي 1/340 من طريق أسباط، عن مطرف، به
وأخرجه الطحاوي 1/340 من طريق إبراهيم بن طهمان، عن أبي إسحاق، به
وسيأتي برقم (653) و (825) و (1152) و (1215) و (1218) و (1260)
وفي الباب عن عائشة عند البخاري (996) ومسلم (745) وسيأتي في "المسند" 6/46

حدثنا محمد بن فضيل، حدثنا مطرف، عن أبي إسحاق، عن عاصم، عن علي، قال: " كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يوتر في أول الليل، وفي وسطه، وفي آخره، ثم ثبت له الوتر في آخره إسناده قوي، عاصم: هو ابن ضمرة، وثقه العجلي وعلي بن المديني وابن سعد والترمذي، وقال النسائي: ليس به بأس، وقال البزار: صالح الحديث، وقال الحافظ في "التقريب": صدوق، وباقي رجاله ثقات رجال الشيخين. مطرف: هو ابن طريف الكوفي، وقد تابعه شعبة وهو ممن روى عن أبي إسحاق السبيعي قبل تغيره وأخرجه البزار (681) من طريق محمد بن فضيل، بهذا الإسناد وأخرجه الطحاوي 1/340 من طريق أسباط، عن مطرف، به وأخرجه الطحاوي 1/340 من طريق إبراهيم بن طهمان، عن أبي إسحاق، به وسيأتي برقم (653) و (825) و (1152) و (1215) و (1218) و (1260) وفي الباب عن عائشة عند البخاري (996) ومسلم (745) وسيأتي في "المسند" 6/46

হাদিসের মানঃ সহিহ (Sahih)
পুনঃনিরীক্ষণঃ
মুসনাদে আহমাদ
মুসনাদে আলী ইবনে আবি তালিব (রাঃ) [আলীর বর্ণিত হাদীস] (مسند علي بن أبي طالب)

পরিচ্ছেদঃ

৫৮১। হুসাইন (রাঃ) থেকে ও তিনি তাঁর পিতা থেকে বর্ণনা করেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেনঃ কুষ্ঠরোগীদের দিকে এক নাগাড়ে তাকিয়ে থেকনা। তাদের সাথে কথা বলার সময় বর্শা পরিমাণ দূরত্ব বজায় রেখ।

حَدَّثَنَا عَبْدُ اللهِ، حَدَّثَنِي أَبُو إِبْرَاهِيمَ التَّرْجُمَانِيُّ، حَدَّثَنَا الْفَرَجُ بْنُ فَضَالَةَ، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ عَبْدِ اللهِ بْنِ عَمْرِو بْنِ عُثْمَانَ، عَنْ أُمِّهِ فَاطِمَةَ بِنْتِ حُسَيْنٍ، عَنْ حُسَيْنٍ، عَنْ أَبِيهِ، عَنِ النَّبِيِّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، قَالَ: " لَا تُدِيمُوا النَّظَرَ إِلَى الْمُجَذَّمِينَ، وَإِذَا كَلَّمْتُمُوهُمْ، فَلْيَكُنْ بَيْنَكُمْ وَبَيْنَهُمْ قِيدُ رُمْحٍ

إسناده ضعيف، فرج بن فضالة ضعفه غير واحد، وقال أبو حاتم: صدوق يكتب حديثه ولا يحتج به، ومحمد بن عبد الله بن عمرو بن عثمان- وهو المعروف بالديباج لحسنه- قال البخاري في "التاريخ الكبير" 1/139 وفي "الضعفاء" (325) : عنده عجائب، وقال ابن الجارود: لا يكاد يتابع على حديثه، وقال النسائي: ليس بالقوي،. وقال مرة: ثقة! ووثقه ابن حبان والعجلي. وأمه فاطمة بنت الحسين بن علي تابعية ثقة، قال ابن سعد في "الطبقات" 8/473: تزوجها ابن عمها حسن بن حسن بن علي بن أبي طالب، فولدت له عبدَ الله وإبراهيمَ وحسناً وزينب، ثم مات عنها فخلف عليها عبدُ الله بن عمرو بن عثمان بن عفان زوجها إياه ابنها عبد الله بن حسن بأمرها، فولدت له القاسمَ ومحمداً ورقية
قلنا: وقد وقع في هذا الحديث اضطراب، فقد أخرجه أبو يعلى (6774) ، وابن عساكر 19/لوحة 490 من طريق فرج بن فضالة، وابن عدي في "الكامل" 4/1473 من طريق عبد الله بن الحارث، كلاهما عن عبد الله بن عامر الأسلمي، عن محمد بن عبد الله بن عمرو بن عثمان، عن أمه فاطمة بنت الحسين بن علي، عن أبيها، عن النبي صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّم
جعلوه من مسند الحسين، وعبد الله بن عامر ذاهب الحديث
وأخرجه كذلك الطبراني (2897) من طريق يحيى الحماني، عن ابن المبارك، عن الحسين بن علي بن الحسين، عن فاطمة بنت الحسين، عن أبيها، عن رسول الله صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّم
ويحيى الحماني ضعيف. وعلقه البخاري في "التاريخ الكبير" 1/139، وفي "التاريخ الصغير" 2/77 فقال: وقال ابن المبارك، به
وأخرجه الطبري في "تهذيب الآثار" في مسند علي ص20 من طريق أبي فضالة فرج بن فضالة، عن عبد الله بن عامر الأسلمي، عن محمد بن عبد الله بن عمرو بن عثمان، عن أمه فاطمة بنت الحسين، عن أبيها الحسين بن علي، عن أمه فاطمة قالت - فيما أرى-: قال رسول الله صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ ... فذكره، وجعله من مسند فاطمة بنت النبي صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّم
وسياْتي في "المسند" برقم (2075) من طريق عبد الله بن سعيد بن أبي هند، عن محمد بن عبد الله بن عمرو بن عثمان، عن أمه فاطمة بنت الحسين، عن عبد الله بن عباس، وأورده الحافظ في "الفتح" 10/159 عن ابن ماجه، وضعف إسناده
وأما حديث معاذ بن جبل الذي أخرجه الطبراني في "الكبير" 20/ (222) بلفظ
"المجذمين لا تديموا النظر إليهم"، ففيه الوليد بن حماد الرملي شيخ الطبراني، قال الهيثمي في "المجمع" 5/101: لم أعرفه، وبقية رجاله ثقات

حدثنا عبد الله، حدثني أبو إبراهيم الترجماني، حدثنا الفرج بن فضالة، عن محمد بن عبد الله بن عمرو بن عثمان، عن أمه فاطمة بنت حسين، عن حسين، عن أبيه، عن النبي صلى الله عليه وسلم، قال: " لا تديموا النظر إلى المجذمين، وإذا كلمتموهم، فليكن بينكم وبينهم قيد رمح إسناده ضعيف، فرج بن فضالة ضعفه غير واحد، وقال أبو حاتم: صدوق يكتب حديثه ولا يحتج به، ومحمد بن عبد الله بن عمرو بن عثمان- وهو المعروف بالديباج لحسنه- قال البخاري في "التاريخ الكبير" 1/139 وفي "الضعفاء" (325) : عنده عجائب، وقال ابن الجارود: لا يكاد يتابع على حديثه، وقال النسائي: ليس بالقوي،. وقال مرة: ثقة! ووثقه ابن حبان والعجلي. وأمه فاطمة بنت الحسين بن علي تابعية ثقة، قال ابن سعد في "الطبقات" 8/473: تزوجها ابن عمها حسن بن حسن بن علي بن أبي طالب، فولدت له عبد الله وإبراهيم وحسنا وزينب، ثم مات عنها فخلف عليها عبد الله بن عمرو بن عثمان بن عفان زوجها إياه ابنها عبد الله بن حسن بأمرها، فولدت له القاسم ومحمدا ورقية قلنا: وقد وقع في هذا الحديث اضطراب، فقد أخرجه أبو يعلى (6774) ، وابن عساكر 19/لوحة 490 من طريق فرج بن فضالة، وابن عدي في "الكامل" 4/1473 من طريق عبد الله بن الحارث، كلاهما عن عبد الله بن عامر الأسلمي، عن محمد بن عبد الله بن عمرو بن عثمان، عن أمه فاطمة بنت الحسين بن علي، عن أبيها، عن النبي صلى الله عليه وسلم جعلوه من مسند الحسين، وعبد الله بن عامر ذاهب الحديث وأخرجه كذلك الطبراني (2897) من طريق يحيى الحماني، عن ابن المبارك، عن الحسين بن علي بن الحسين، عن فاطمة بنت الحسين، عن أبيها، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم ويحيى الحماني ضعيف. وعلقه البخاري في "التاريخ الكبير" 1/139، وفي "التاريخ الصغير" 2/77 فقال: وقال ابن المبارك، به وأخرجه الطبري في "تهذيب الآثار" في مسند علي ص20 من طريق أبي فضالة فرج بن فضالة، عن عبد الله بن عامر الأسلمي، عن محمد بن عبد الله بن عمرو بن عثمان، عن أمه فاطمة بنت الحسين، عن أبيها الحسين بن علي، عن أمه فاطمة قالت - فيما أرى-: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم ... فذكره، وجعله من مسند فاطمة بنت النبي صلى الله عليه وسلم وسياتي في "المسند" برقم (2075) من طريق عبد الله بن سعيد بن أبي هند، عن محمد بن عبد الله بن عمرو بن عثمان، عن أمه فاطمة بنت الحسين، عن عبد الله بن عباس، وأورده الحافظ في "الفتح" 10/159 عن ابن ماجه، وضعف إسناده وأما حديث معاذ بن جبل الذي أخرجه الطبراني في "الكبير" 20/ (222) بلفظ "المجذمين لا تديموا النظر إليهم"، ففيه الوليد بن حماد الرملي شيخ الطبراني، قال الهيثمي في "المجمع" 5/101: لم أعرفه، وبقية رجاله ثقات

হাদিসের মানঃ যঈফ (Dai'f)
পুনঃনিরীক্ষণঃ
মুসনাদে আহমাদ
মুসনাদে আলী ইবনে আবি তালিব (রাঃ) [আলীর বর্ণিত হাদীস] (مسند علي بن أبي طالب)
দেখানো হচ্ছেঃ থেকে ২০ পর্যন্ত, সর্বমোট ৮১৯ টি রেকর্ডের মধ্য থেকে পাতা নাম্বারঃ 1 2 3 4 5 6 · · · 40 41 পরের পাতা »